हम जब छोटे होते तो सबसे ज़्यादा अपने परिवार से डरते हैं।बाहर का कुछ भी गलत मेरे परिवार को न पता चले।हमारा परिवार चाहे जिस क़दर गलती करे मगर हम उसे गलत कहने की हिम्मत बचपन में ला नही पाते।यानि कुल मिलाकर पहला डर अपने आप से होता है।स्कूल की लड़ाई घर न पहुँच जाए।स्कूल बस की मोहब्बत घर न पहुँच जाए।दोस्तों के साथ क्लास बंक करना कहीं घर वालो को न पता चल जाए।यानि हमारी शुरआत हमारे अपनों के डर से होती है।फिर हम बड़े होते हैं।नौकरी करते हैं।फिर डर की हमारी कम्पनी का डर।
हमारे ऑफिस का डर।यह बात ऑफिस में न पता चल जाए।मेरी यह दिक्कत कम्पनी में खुल न जाए।यानि यहाँ भी अपने से ही डर।अगर हम।किसी संगठन या पार्टी में हैं तो यहाँ भी डर।अपने लीडर से डर की उसे कहीं मेरी कमज़ोरी न दिख जाए।अपने लीडर की सैकड़ो कमज़ोरी पर वही ख़ामोशी जो परिवार के लिए थी।अपने कम्पनी के बॉस की कमियों पर वही पर्दा जो पहले घर के बड़ो की करतूतों पर हम डालते थे।यह हम इसलिए बता रहे हैं की हमारा मनोविज्ञान समझो।जो व्यक्ति शुरआत से डर के एक साय में रहा हो,जो की उसपर लादा भी नही गया,उसने खुद गढ़ा हो वोह हमेशा इसका बोझ उठाएगा।
वोह कभी हिम्मत करके अपने बॉस, कलीग,लीडर,संगठन,पार्टी,धर्म के विरुद्ध नही जा पाएगा।उसे हमेशा डर रहेगा की हमारे अपने नाराज़ हो सकते हैं।तो ऐसे लोगों पर ज़बरदस्ती कुछ मत लादो,इन्हें वक़्त दो,शायद अच्छा बुरा देखना आ ही जाए।वरना जैसे भीड़ में जन्म लिया है, भीड़ बनकर खत्म भी हो जाएँगे।इनमे जो अपने दिमाग से काम लेगा वोह बिरला ही होगा क्योंकि उसे अपने अंदर का बहुत कुछ पता होगा।जो अपनी कमियां जानकर नेतृत्व देता है वोह लम्बे वक़्त तक नेतृत्व करता है।बहुत बड़ी हिम्मत चाहिए गलत होते हुए देखकर अपनों से बगावत के लिए।इसके लिए पूरे बचपन से जवानी तक का ज़ोर एक झटके में लगाना पड़ता है, जो सबमें नही हो सकता।
मेरा तो सिर्फ इतना मानना भर है की जो समाज का रूप हमे आज दिखता है, वोह कहीं न कहीं हममे बहुत पहले बीज की शक्ल में डाल दिया जाता है।अब अगर जिसे आज समाज कुरूप दिखाई दे तो वोह सुंदर बनाने की क्रीम लेकर न खड़ा होए,यह क्रीम भरम है।उसे सुंदर समाज के बीज रोपने होंगे।और जिसे यह समाज सुंदर नज़र आ रहा हो वोह इसकी खूबसूरती सम्भालने में लगे,सिर्फ निहारे ही नही।जो धैर्य से आगे बढ़ेगा लम्बे समय तक वही राज करेगा वोह चाहे अच्छा हो या बुरा
No comments:
Post a Comment