Wednesday, April 5, 2017

यह एक्टिविज्म से पहले करो

जिनके लिए तुम खड़े लड़ रहे हो।जिनके लिए तुम अपने आप को एक्टिविस्ट कहते हो।जिनकी भूख की चिंता में तुम्हारे कई वक़्त के खाने छूटे जा रहें हैं, तो ज़रा ठहर जाओ।फ़र्ज़ी गिरफ्तारियों,
धर्मांध हत्याओं,दुष्कर्मो के विरुद्ध हर संवेदनशील खड़ा ही हो जाएगा मगर रुक कर सोच लो।यह तय करो की जिनके लिए तुम लड़ना चाहते हो,क्या वोह लड़ना चाहते हैं।जिनकी प्यास की फ़िक्र में तुम सैकड़ो मील की यात्राएँ करते हो,क्या वोह यह चाहते हैं।

मुझे तो लगता है की जिनकी हम फ़िक्र करते हैं वोह बेफिक्र दूसरे इंतजामो में जुटे रहते हैं।मैं सालों से देख रहा हूँ की लड़ने वाला ज़्यादा बेचैन है जबकि जिनके लिए लड़ा जा रहा है वोह तब तक बाहर नही निकलते जब तक दर्द और तक़लीफ़ उनके दरवाज़े तक न आ जाए।
ऐसे में सड़क पर लड़ने या विरोध करने से बेहतर है लोगों में उतरो।उन्हें पहले अन्याय,अधर्म,पाप,दुष्कर्म के विरुद्ध तैयार करो।उनसे पूछे या तो यह सब स्वीकार कर लो या तो निकल चलो।बीच का मार्ग केवल बुराई के लिए दावतनामा है।बस समाज की फ़िक्र करने वालों पहले समाज को समझ लो।समाज अगर बेचैन नही है तो सब कोशिश के बावजूद वोह हर चीज़ पर मौन रहेगा और तुम अकेले दोनों तरफ के खलनायक होगे।

मैं फिर कह रहा हूँ यह जो रोज़ हत्याये हो रही हैं यह एक दिन या हफ़्ते के विरोध से रुक नही जाएँगी।इसके लिए उस समाज को उठना होगा।समाज को उठने के लिए उसे समझना होगा।खैर मुझे अब किसी चीज़ से कोई फ़र्क नही पड़ता।मैं खुद इंतज़ार में हूँ की कब कोई आएगा और मेरी उँगलियों के टुकड़े करके अगले दिन के हैशटैग में चिपका देगा।पता नही कब मेरी गर्दन किसी मज़हब के लिए सवाब बन जाए।पता नही कब मेरा ख़ून किसी की सदियों से जमी इंतकाम की आग को बुझा दे।दिल पत्ते पर टिका है, कब हवा चली और कब गिरा।।मुझसे उस इतिहास का बदला लिया जाएगा जिसको बनाने में मेरा रत्ती भर योगदान नही है।हमे पता है जब यह हालात हमारे मुँह पर तमाचा है।जब हम किसी बीमार पर हँसते हैं तो ईश्वर वोह बीमारी कभी न कभी हमे भी दे ही देता है।कल तक हम अपने पड़ोसियों की धर्मान्धता पर हँसते थे,मज़ाक उड़ाते थे,आज अपने पैर से आँखे उठ भी नही पा रही हैं।

खैर रास्ते दो हैं एक या तो आराम से लिखते पढ़ते कमाते रहो दूसरा यह है की ज़ुल्म के खिलाफ उनको इकट्ठा करो जो वाक़ई इसे ज़ुल्म समझते हैं।वरना मज़े में रहो और मज़े से अपना इंतज़ार करो।जँगल की आग एक पेड़ के लिए नही लगती और न ही एक नस्ल के पेड़ के लिए लगती है।देर सबेर बाँस,शीशम,पीपल,नीम,बेल सबको लपेट में आना ही होता है।वैसे मुझे अभी कोई खास बेचैनी नही है,क्योंकि मेरे इर्द गिर्द सब गहरे सुक़ून में हैं।अभी तो मैं बस इंतज़ार में हूँ...

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