Monday, April 3, 2017

रूमी और शम्स


एक शाम मशहूर सूफ़ी और दार्शनिक रूमी दरिया किनारे कुछ लिख रहे थे।उनके इर्द गिर्द उनकी खुद की लिखी किताबों का ढेर लगा था।उस दौर में किताबें हाथ से लिखी जाती थी।रूमी इतने ऊँचे दर्जे के विद्वान थे की उनसे दूर दूर से लोग पढ़ने आते थे।रूमी दरिया किनारे ख़मोशी और मन की गहराइयों से कुछ लिखने में व्यस्त थे की तभी शम्स तबरेज़ उनके पास आए।शम्स तबरेज़ बिल्कुल फटे हाल,उजड़े से बालों के साथ उनके सामने आकर बैठ गए।रूमी ने उनको देख उनका हाल पूछा और फिर लिखने लगे।शम्स तबरेज़ ने उनके इर्द गिर्द ढेर किताबों को देखा।वोह रूमी जैसे विद्वान तो नही थे तो पूछ बैठे यह क्या हैं, इनमे क्या है।अपनी विद्वता पर गर्व करने वाले रूमी ने कहा इसमें जो है वोह तुम नही जानते।यह इल्म है तुम्हारे बस का नही।
शम्स तबरेज़ ने फौरन किताबो को उठाया और दरिया में फेक दिया।अपनी बरसों की मेहनत को पानी में डूबता देख रूमी चीख़ पड़े।यह क्या किया शम्स,मेरी सारी मेहनत तबाह कर दी।शम्स मुस्कुराए और कहा ठंड रख रूमी और दरिया में हाथ डाल एक किताब निकाली।एक के बाद एक किताबें सब पानी से हाथ डालकर दरिया से निकाल दीं।रूमी की आँखे खुली रह गई जब एक भी किताब न भीगी और न खराब हुई।उन्होंने शम्स से कहा यह क्या है शम्स और कौन सा इल्म है।शम्स ने कहा यह वोह जो तुम्हे नही आता।यह इल्म तुम्हारी समझ से बाहर है।यह कहते हुए शम्स वहाँ से चले गए।
इसीलिए कहा जाता है किसी को कम मत समझो।अपने ज्ञान पर इतराओ मत हो सकता है सामने वाले को वोह आता हो जो तुम्हे न आता हो।ईश्वर ने हर एक को खूबियाँ दिया है,इसलिए सबकी इज़्ज़त करे।

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