बदन में फोड़ा पड़ जाए तो एक अच्छा जर्राह उसका इलाज अपने हिसाब से करेगा।कभी भी वोह गलती से कच्चे फोड़े को दबाएगा नही।वरना यह नासूर बन सकता है इसलिए वोह उस कच्चे फोड़े पर ऐसा मरहम रखता है की यह बहुत जल्दी पक जाए।पकते ही दबाकर सारा पस बाहर और तक़लीफ़ कम।
अब ज़रा अपने समाज को देख लीजिये।यहाँ फोड़ा अभी कच्चा है इसलिए सूजन,सुर्खी और तक़लीफ़ भयंकर है।मैं किसी एक धर्म पर अगर आज ऊँगली उठाऊँ तो यह मेरी मूर्खता होगी।किसी एक देश पर हाथ रखूँ तो बेवक़ूफ़ी।हर तरफ एक जैसे लोग हैं जो अपने विरोधियों का ख़ून बहा देना चाहते हैं।हर गली कूचे बँट चुके हैं।दुनिया के ज़्यादातर देश ख़ून की चिपचिपाहट महसूस कर रहें हैं।सबने अपने अपराजित,शौर्यवान,साहसी बादशाहों को चुन रखा है।सबके मुखिया अब इंसान तो हैं नही शेर हैं।शेर का न्याय चीरने फाड़ने से शुरू होता है और वहीं खत्म।
खैर अब जो खुद को समाज के जर्राह समझते हैं वोह यह जान ले कच्चे फोड़े को किसी भी हाल में बैठाया नही जा सकता है।हाँ बस हो सके तो इसे जितनी जल्दी पका कर फोड़ सकिये तो यह आपका ईलाज।ढेर सारा मरहम तैयार रखिये और दिल को सख़्त कर लीजिये।
यह भी समझ लो यहाँ कोई पन्थ,कोई वाद मासूम नही है जिसे जब मौका मिलेगा चाकू भोक अंतड़ियां बाहर खींच लेगा।अब घर में मरहम मत बनाने लग जाना।मरहम से ताल्लुक़ है अपने बच्चों को ऐसे बनाओ की वोह समाज का मरहम बने।
चुपके चुपके उन्हें घर में इंसान बनने की ट्रेनिग तो जो बाहर नही मिलेगी।उन्हें तैयार करो जब कोई ख़ून से लथपथ मिले तो गले लगाकर उसके ज़ख्म दूर करें।उन्हें कल फूटे हुए फोड़े के लिए तैयार करो।यह भी समझ लो समाज में लाखों पर एक जर्राह या डॉक्टर है इसलिए बिना पड़ोसी की फ़िक्र किये खुद अपने बच्चों को समाज का जर्राह बनाओ।इस समाज को हमेशा ऐसे मज़बूत लोगो की ज़रूरत रहेगी।
अच्छा जिन्हें लगता है अभी ऐसे हालात नही हैं तो ज़रा घर से बाहर पाँव को तक़लीफ़ दें और अपने विरोधी विचारों के बीच उनका विरोध करके देखें,सब सामने आ जाएगा।इसमें लड़ने मरने वालों की भी गलती नही,वोह क्या करें,उनमे इन हवाओं से बचने की ताक़त नही है।यह भी समझ लो जब एक बड़ी शहतीर टूटती है तो उसे जोड़ने वाले को ज़्यादा दर्द,ज़्यादा साहस,ज़्यादा त्याग करना पड़ता है।अब बस अपने आप को मज़बूत रखो,नफ़रत की बला आँधियों से अपने बच्चों को बचाए रखो यही सबसे बड़ी जीत है।
वरना यह आँधियाँ इतनी तेज़ हैं की अच्छी अच्छी आँखों में धूल भर चुकी है ऐसी आँधियों में आँख खुली रखना सबसे बड़ी मूर्खता है।आँख बन्द करो ताकि तबाही के बाद आँख खोलकर बचे हुओ की मदद तो कर सको।मैं फिर कह रहा हूँ एक एक,दो दो लोगों को कल के लिए तैयार करो।यह दुनिया कभी नही रुकी है।अब इसके फोड़े के पकने का वक़्त नज़दीक़ है।सब तरफ नफ़रत बुलन्दी पर है, तो तुम कल की तैयारी करो।आज तो तक़लीफ़ और दर्द को कोई नही रोक पाएगा क्योकि यह कल का बोया हुआ है।उठो और मज़बूत होकर समाज के डॉक्टर बनाओ।अब खुद इलाज करने की जगह ढेर सारे नए डॉक्टर बनाने का वक़्त है क्योंकि कल इनकी ही ज़रूरत रहेगी और यह कम होंगे।
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