अगर रँग ही चरित्र को दिखाते तब भी तुम बेहद बिखरे बिखरे से होते।मगर तुम यहाँ भी सिर्फ अपने आप की सुनाने के लिए एक रँग के पीछे भागते हो।सबसे कहते हो की यह रँग धरा पर छा गया है।
अगर हम हरे और लाल रँग को ही ले लें तो चलिए प्रकृति की ओर, जहाँ से यह रँग पैदा हुए हैं।हर पेड़ की पत्ती का हरा रँग अपने आप में अलग है।जब मुझे लगता है यह हर तरफ हरे रँग की आँधी आनी चाहिए तो मुझे यह पत्तिया रोककर पूछती हैं कौन से हरे रँग की,और मैं रुक जाता हूँ।फिर सोचता हूँ की चलो यह हर तो बहुत बंटा हुआ है लाल को पकड़ता हूँ।
तो यही लाल रँग के फूल हर गमले,क्यारियों में अलग अलग लाल लिए खड़े मिलते हैं।ईश्वर भी कैसा निर्माता थी की एक रँग को भी एक नही कर सका।गेरुआ रँग जब देखता हूँ तो कब वोह नारंगी तो कब वोह लाल हो जाता है पता भी नही चलता।यह जो प्रकृति है न इसने अपने आप को इस क़दर खाँचो में बाँट रखा है फिर भी वोह एक हैं।हरा रँग अपने को नीचे रख हमे लाल से मिलवाता है की इसकी खूबियाँ देखो और इसे सराहो।
खैर अब जब समाज कुछ रँगो में बुरी तरह बट चुका है तो हम जैसे कुछ कमअक्ल लोग समझ नही पाते की कौन सा रँग अपनाए।हरा हज़ारों अलग अलग हरे में बिखरा पड़ा है तो लाल लाखों लाल बनकर छटा बिखेर रहा है।
खैर जिन्हें लगता है वोह एक रँग की आँधी लाकर बहुत दिन टिक पाएँगे हम भी देखते हैं प्रकृति के विरुद्ध कोई कितना कूदता है।हमे तो लगता है की पूरी दुनिया का चरित्र ही प्रकर्ति के विरुद्ध हो चुका है।हमे नही फ़िक्र की पेड़ रह जाएँगे की नही,पहाड़ कहाँ जा रहे नही पता,नदियां दम तोड़ रहीं,हमे इससे क्या।
हम तो भोगने आए हैं, अपने आने वाले बच्चों के हिस्से की भी ऑक्सीजन हम भोगकर मुस्कराते हुए निकल जाएँगे।पीछे छोड़ जाएँगे तो सिर्फ कृत्रिम रँगो से बंटा हुआ बिखरा बिखरा,टूटा टूटा,उजड़ा उजड़ा संसार।हमारी प्रकृति के लिए सोच खत्म हो चुकी है क्योंकि हमने इंसानों में ही ईश्वर खोज लिए हैं।अब हमे हमारे बीच के ईश्वर खींचते हैं, हमे नही ज़रूरत प्रकर्ति की,हमे हमारे बनाए कृत्रिम संसार में पॉर्टरी फॉर्म की मुर्गियों वाली ज़िन्दगी अब खूबसूरत लगने लगी है।हम यही में सुरक्षित भी हैं।
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