तुम खामोश थे,यह कहना झूठ होगा मगर जब तुम चीख़ रहे थे तब भी तुम्हारी चीखों में आवाज़ नही थी।जब तुम्हारे बीच से सबसे उपजाऊ हिस्से को ऊसर किया जा रहा था तब तुम बिना आवाज़ की चीखें लगा रहे थे।आज तुम उसकी ढपली टाँगे उसके जैसा बनने की कोशिश करते हो,नाटक करते हो मगर ऐसी हॉल में,नाटको से बदलाव के लिए भीड़ जुटाते हो मगर शहर की क्रीम इकट्ठी करने के अलावा कुछ नही कर पाते।ज़रा जिनका नाम सुबह शाम लेते हो उस नौजवान की ज़िन्दगी पर नज़र डालना की तुम हॉल की बंदिश नही तोड़ पाए और वोह लोगों में उतर गया।"हल्ला बोल" किया और वही क़त्ल हो गया।34 साल के नौजवान का ख़ून भी यह ज़मीन पी गई मगर उससे निकली गर्माहट ने बहुतों के बच्चों को उसके जैसा बना दिया।इस अप्रैल में आँख खोलकर देखना रेणु, राहुल संक्रत्ययन,अम्बेडकर,कस्तूरबा,ज्योतिबा कौन कौन ज़मीन पर आया।सब अपने हिस्से का काम करके चले गए।
12 अप्रैल 1954 सफ़दर हाशमी जैसे हिमालयन किरदार का आना।जन नाट्य मंच के नीव की ईंट हैं सफ़दर। सफ़दर हाशमी ने एक पूरा ज़माना जिया अपने संघर्षो में,नाटको में,लेखन में,सभाओं में।उनकी आवाज़,उनका किरदार,उनकी कलम लोगों के दिलों पर नक्श हो जाती थी।बहुतों की ज़बरदस्त मुखालफत हो सकती है सफ़दर से मगर इससे उनकी खूबियां कम नही हो जाती।
सफ़दर हर संघर्ष में ज़िंदा हैं।एक वक़्त आता है जब आपका त्याग आपको झंडो,दलों, समूहों,संघो से आज़ाद करके सबका कर देता है।वैसे ही अब सफ़दर सबके हैं।हर टूटती, बिखरती,मचलती,कसकती,चीखती सबकी आवाज़ हैं सफ़दर।वोह जिसके नुक्कड़ नाटक सरकारों की चूले हिला देते।वोह जिसकी ढपली से निकली आवाज़ तानाशाही के सुर कमज़ोर कर देती थी।वोह जिसका प्रतिरोध का नाटक इस क़दर चुभता की उसे वहीं 34 की उम्र में शहीद कर दिया।
मैं सोचता हूँ यह कौन से लोग थे जो इतनी कम उम्र में इतना बड़ा कुछ कर गए।मुझे इनकी परम्परा को ढोने वालों को देख गहरी निराशा होती है।सफ़दर जो गाँवो,कस्बो,शहरो में नुक्कड़ नाटक करते रहते उनको मानने वाले अमीरों की चौखट पर ही संघोष्ठीय करते नही इतराते।सफ़दर के जनता के नाटक अब प्रतिष्ठित लोगों के नाटक हो चुके हैं।मुझे ऐसा होने से ज़रा भी फ़र्क नही पड़ता।
आप अमीरो को मनोरंजन दे इसमें कोई बुराई नही,कीजिये।आप उनके सामने ही अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें,उनमे आपको सराहने की कुदरती सलाहियत मौजूद है।हाँ वहाँ सफ़दर नही होंगे।जो खुद इस चमक को तोड़ गलियों में कूद गया।जो खूबसूरत,मदमस्त,चमकदार खाल वाला लड़का खुद को धूल में झोककर निकल गया।खैर आज अगर सफ़दर हाशमी को याद कीजियेगा तो उनका किरदार देखिएगा।अपनी अवाम के लिए तड़प को देखिएगा।सेमिनारों में जब तक सफ़दर का ज़िक्र होगा।जब तक कुछ जाने हुए लोगों के सामने ही सफ़दर के नाटको का मंचन होगा,तब तक सफ़दर की रूह यूँहीं बेचैन करती रहेगी।
जब तुम्हारी ढपली सुर देने का काम करे तो यह कमज़ोर होगी।जिस दिन यह ढपली पापियों के कान के पर्दे हिला दे उस दिन वोह सफ़दर के हाथ की ढपली होगी।यूँहीं नही कोई 34 की उम्र के नौजवान पर वक़्त बर्बाद करता है।उन्होंने जी कर और मरकर दिखा दिया की इंसानियत उनके सबसे ऊपर है, बाकि सब घुटनों के नीचे।सफ़दर मेरे दिल की हलचल हैं।हो सके ढूंढ कर पढ़ना,पढ़कर उतारना और वक़्त से बिना डरे आँख में आँख डालकर बात करने की हिम्मत पैदा करना जैसे सफ़दर में थी।
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