Tuesday, April 25, 2017

चौदहवीं आशिक़ी

भूलने को तो नही कहेंगे।तुम मुझे भूलना मत।हाँ जब तुम अपने पति के गले में फूलों की माला डालना तब मेरी लम्बी गर्दन को न महसूस करने लग जाना।तुम्हारे पति की गर्दन न होने की हद तक छोटी है।लोहिया पार्क की बँसवाड़ी के नीचे जब तुम मेरे गले में चार फूल और सिर्फ धागे की माला डाल कसमे खा रही थी,उसे तो भूल ही जाना।

हाँ जब तुम उसका एटीएम लेना तो वही दिन वापिस कर देना मेरी तरह हफ्ता भर मत रखे रहना।जब तुम मेरा एटीएम नही दे रही थी तो मैं सोचता था की क्यों दो,यह सब है तो तुम्हारा ही।मेरी कमाई और किसके लिए थी।तुम उसके सामने लिखने मत बैठ जाना,एक तो बेतुकी कविता लिखोगी,ऊपर से लिखते लिखते कहीं मेरी आँखों की तारीफ़ न लिख जाना।तुम्हारी सोलह कविताओं के चालीस छंदों में मेरी भूरी आँखों कही ज़िक्र है।इसलिए कहीं लिखते लिखते उसकी काली आँखों में मेरी भूरी आँखे न मिला देना।

तुम अब उन रेस्टोरेंट में भी मत जाना जिनके वेटर तुम्हे तब तक पानी नही देते थे जब तक मैं नही आ जाता था।वोह तुम्हे तब भी पानी नही देंगे,तुम्हे पता है, इसलिए उन वेटर का इम्तेहान मत लेना,वरना फेल ही हो जाओगी जैसे रेडियो के इम्तेहान में हुई थीं।क़ाफ़ को काफ कहकर बाहर कर दी गई थीं।तब तुमने चीखकर कहा था की यह मनहूस उर्दू,तभी मैंने..खैर छोड़ो।।हाँ वोह पराग में मत जाना वरना वोह बूढ़ा वाला वेटर तुमसे ज़रूर पूछेगा की मैम आपकी और सर की आज कुल कितने लीटर चाय हो गई जबकि उसे नही पता की तुम छाछ वाले के साथ अब नाप तोल कर रही हो।

अब जुगलकिशोर ज्वेलर्स में लेकर अपने पति को न चली जाना वरना वोह फिर वोह दिल शेप वाली हीरे की अंगूठी लेकर गले पड़ जाएगा।उसे पता है तुम्हे दो सौ रिंग दिखाने से अच्छा है एक यह दिखाओ और तुम झट से बाहर निकल जाओगी।अच्छा यह बताओ वोह तुम्हारी आँख देख कैसे जान जाता था की तुम्हे न लेना एक न देना दो है सिर्फ देखे जा रही हो।मैं तो आजतक तुम्हारी आँख में ऊपर उतरे पानी के अलावा कुछ नही देख पाया।अरे उसदिन जब हम पुराना लखनऊ घूमने गए थे तब तो तुम्हारी आँख का कीचड़ घण्टे भर बाद दिखा था,मेरी कमबख्त आँखे।

तुम्हे तो कोई भी बात एक बार में समझ ही कहाँ आती थी,यह शिकायत करते करते मैं पोस्ट ग्रेजुएट हो गया मगर तब अंदाज़ा हुआ की हाँ तुम्हे मैं नही समझ पाया।तुम तो भक्ति रस ढूंढ रही थीं और मैं श्रंगार रस लिए खड़ा था।खैर जाओ और अपने पति में मुझे मत खोजने लगना।उसकी ज़्यादा तारीफ़ मत करना वरना वोह समझ जाएगा की तुम रट्टा मारकर आई हो जैसे मैं समझ जाता था।इस आखरी ख़त का जवाब मत देना वरना तुम लिखती लिखती सुभद्रा कुमारी चौहान हो जाओगी और इतना वीर रस उड़ेल दोगी की मैं कल फिर शूरवीर बनकर खैर जाओ,काहे का शूरवीर,दफ़ा हो जाओ अपना बेले वाला इतर लेकर।मुझे बेले से ही नफ़रत हो गई है।

No comments:

Post a Comment