Friday, April 7, 2017

यूनिफॉर्म vs स्टडी

अगर स्कूल गए होंगे तो शायद कुछ याद भी होगा।स्कूल में जो टीचर नाख़ून,राइटिंग,यूनिफॉर्म के धब्बे,जूतों की पॉलिश, सर के तेल और माँग, बैग में बेतरतीब रखी किताबों को ज़्यादा देखा करते थे,सच में वोह अपने आप में पढ़ाने में बेहद कमज़ोर ही होते थे।

पढ़ाने के सिवा वोह हर काम कर सकते थे,करते थे।कोई कोई हद दर्जे के चालाक होते की इतना मारते की सामने वाले बच्चे से सवाल फूटने में रूह निकल जाए।
अब जो पूरी एक जेनरेशन इन्ही के साए में बढ़ी होगी वोह यही सब प्रैक्टिकल करना चाहेगी।उसे लगता है लम्बे नाख़ून से मैथ रूठ जाएगी।बालों में तेल नही लगाया तो केमिस्ट्री का तेल निकल जाएगा।जूतों पर पॉलिश नही की तो फिज़िक्स बेवा हो जाएगी।सफ़ेद शर्ट पर एक भी धब्बा है तो वोह धब्बा पुरे स्कूल की इज़्ज़त पर है।

यह सच है जिसे जो नही आता, उसे छुपाने के लिए उसे इर्द गिर्द एक ऐसा जाल बुनना होता है जिससे उसकी कमज़ोरी तक नज़र न जाए।यह स्कूल से होते हुए,समाज,परिवार और राजनीति सबमें आ जाती है।जब कोई अनुशासन के नाम पर आंतरिक परिवर्तन की जगह बाहर के दिखने वाले परिवर्तन पर बात करता है तो मूल समस्या बनी रह जाने की पूरी सम्भावना रह जाती है।
खैर स्कूल में सबसे ज़्यादा मशहूर यही टीचर होते हैं, क्योंकि यह नाख़ून काटने के बहाने हर बच्चे के सम्पर्क में आ जाते हैं।
इस मामले में गणित के टीचर अगर वाक़ई गणित जानते हैं तो थोड़ा अलग नज़र आते हैं।वोह दिखने में बड़े लापरवाह होते हैं क्योंकि उनके अंदर की समीकरण सही होती हैं।वोह पायथागोरस को पढ़ाते हुए कब अपने बचपन के इश्क़ में घुस जाते हैं पता भी नही चलता।
खैर अंदर से सुधरो या न सुधरो।चरित्र अच्छा हो या न अच्छा हो।काम अच्छे करो या करो।दिल में मोहब्बत की जगह भले नफ़रत ही रहे फिर भी ऊपर से चाक चौबंद नज़र आओ।

वैसे भी हमारी आदत हो चुकी है बढ़िया पैकिंग में बेकार चीज़ें खरीदने की।कई बार तो लगता है यह बढ़िया पैकिंग वाला कॉन्सेप्ट भी उन्ही तरह के टीचर की बड़ी खोज है।एक आध बार तो हमे बहुत मेंटेन लोग सुंदर,साफ़ सुथरे चमकदार साँप नज़र आते हैं।अच्छा एक मिटटी से लथपथ केचुआ पड़ा हो और एक नफीस,चमकदार,साँप पड़ा हो आपकी हिम्मत किसे हाथ में लेने की पड़ेगी।
चलिए अच्छा अपनी पैकिंग पर ध्यान दीजिये,हमारी बातों में उलझिये मत।हमे आज शिद्दत से अपने वोह टीचर बड़े याद आ रहे थे।मेरे जूते पर महीनो से पॉलिश नही होने की वजह से कहीं उनकी आत्मा ऊपर न चली गई हो।बहुत याद आ रहे हैं माटसाहब।

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