तुम्हे पता है यह जो देवनागरी लिपि है यह जँगल से निकली है।हर अक्षर को पेड़ पर लटकते जानवरों की छाया से बुना गया है।संगीत भी जँगल से निकला है।खाना,पहनना यहाँ तक तुम्हारी हर हरकत इन जंगलो से ही निकली है।हम सबको पता है इस भूमि से निकले हर धर्म की पृष्ठभूमि जँगल में बनी है मगर कोई उसे बचाना नही चाहता।जँगल में बुद्ध,राम,नानक,महावीर,कृष्ण,शिव सब रहे मगर अब कोई भी धर्म को ओढ़े इंसान इन्हें खत्म करने के लिए आलोचना नही करता।जिनके पैगम्बरों ने पौधे रोपे, उन्हें बचाने के फरमान दिए वोह दूसरे की ज़िन्दगी को उलझाने में लगे हैं, वोह भी नही उठते,नही कहते की हमारे पेड़ो जंगलो को काटना अधर्म है।हरे पेड़ को सुखा देना ज़ुल्म है।तकलीफ़ होती है जब इन जँगल को खत्म होते देखता हूँ।इन्हें कटवाने वालों को जाहिल भी नही कह सकता।एक झटके में हज़ारों पेड़ काटकर कमबख्त विकास करना चाहते हैं, झूठे।
देखते देखते बहुत से जँगल हमारे इर्द गिर्द के कहाँ गए पता नहीं।अब कोई नही खड़ा होता चिपको आंदोलन जैसा।जब सरकारें हरे हरे पेड़ो को काटकर कंक्रीट का शहर खड़ा करती हैं तब तकलीफ़ होती है।पानी को तरसेंगे हम सब इसका पुख़्ता यकीन है।मैं एक पेड़ को कटता हुआ देखता हूँ तो सोचता हूँ हमारे आने वाले बच्चों की सांसे रुक रही हैं।जिन्हें ज़रा भी फ़िक्र है वह आगे आए, उन सरकारों के दामन खींच ले जो आपके बच्चों की सांसे खत्म कर रही हैं।उनका पानी बन्द कर दे जो आपके हिस्से का पानी खत्म कर रहे हैं।अगर वह एक जँगल काँटे तो उनके घरों में इतने पेड़ लगाए की जँगल हो जाए।आइये अपने कदम खुद उठाए, जहाँ जगह दिखे पौधा रोप दे।
माँ-बाप हमे पैदा करते हैं, पालते हैं मगर यह पेड़ ही हमे ज़िंदा रखते हैं।जँगल बचाइये अगर मज़हबी फसादों से फुर्सत मिल जाए।पेड़ लगाइये अगर अपनी संस्कृति बचाए रखनी है तो।हिम्मत करके अपने नेताओं और अफसरों से पूछिये की क्या पेड़,जँगल काटना ही अंतिम विकल्प था।धर्म की रक्षा से पहले सांसो की रक्षा कीजिये।मुझे पता है इस सब्जेक्ट में मसाला नही है, मज़ा नही फिर भी बच्चों की ज़िन्दगी के लिए ध्यान दीजिये।
अर्थ डे, इनवायरमेंट डे, अलाने फलाने डे आते जाते रहेंगे मगर कुछ कारगर नही होगा अगर पेड़ लगाने और बचाने की तरफ से ध्यान हटा लिया है।हमे पता है आजकल आप दूसरे बेहद ज़रूरी मुद्दों में वक़्त दे रहे हैं।घन्टो टीवी चैनल आपको दुनिया के सबसे ज़रूरी कामो में उलझाए हैं।हर एक सरकार आपको सुधारने में लगी हुई है और आपको भी अपने से ज़्यादा पड़ोसी की ज़िन्दगी,रहन सहन,खान पान की फ़िक्र है।तो भाई जब आप इस क़दर संवेदनशील प्रजाति बन ही चुके हैं तो पड़ोस के लोगो के लिए दो चार ऑक्सीजन के ट्रांसफार्मर भी रख दीजिये।ताकि आपका पड़ोसी बढ़िया ऑक्सीजन लेकर आपका एहसानमन्द रहे है।हम आपसे अपने लिए नही कह रहे हैं क्योंकि हमे अच्छे से पता है की आपको अपनी रत्ती भर फ़िक्र नही,आपतो अगल बगल की चिंताओं में दुबले हुए जा रहें हैं।अपने लिए नही मगर दूसरे के लिए जँगल को बचाइये और बढ़ाइये।एक जँगल ही है जो सबको खाना और संरक्षण देता है।वही दे भी सकता है।
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