Sunday, May 21, 2017

साहिर vs शकील+ नज़रिया

"एक शांशाह ने बनवाकर हँसी ताज महल,
दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है।"

शकील जब यह गुन रहे थे तो ताजमहल झूमकर उनकी अगवाई कर रहा होगा।ताजमहल के दर ओ दीवार शकील को अपनी मोहब्बत की दास्ताँ सुना रहें होंगे और वोह हर मोहब्बत की खुशबू को अल्फ़ाज़ में बाँध ज़माने के सामने खोलते चले गए।
फिर जब साहिर ने ताजमहल के आँगन में पाँव धरा, तो ताजमहल ख़ौफ़ से एक पहलू में सिमट गया।उसकी नक़्क़ाशी किसी आँचल में छुप जाना चाहती होगी।जो मीनारे शकील से बातें करती थीं, वोह साहिर के सामने घुटनों के बल बैठ गईं।जब साहिर ने यह अल्फ़ाज़ गढ़े तब तड़प कर ताजमहल ने शर्म से सफ़ेद से लाल हुए चेहरे को खुद में छिपा लिया।

"एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर,
हम गरीबो की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।"

साहिर के यह अल्फ़ाज़ शाहजहाँ के कानों में गर्म सीसे की तरह घुस गए होंगे।शकील के निकले अल्फ़ाज़ों की तरावट ने साहिर की ज़बान से एक उबाल मारा होगा और ताजमहल दरकने की हद तक पहुँचा ज़रूर होगा।।।।
मुझे अल्फ़ाज़ पिरोने वालों से यही तो मोहब्बत है की कब कोई क्या सोचकर कलम चला दे।जो हमे कल तक खूबसूरत दिखता हो वोह एक झटके में बदसूरत दिखने लगे।

कल तक जहाँ मोहब्बत की खुशबू उठती हो,वहाँ ज़ुल्म की किराहियत लेले।खैर शकील और साहिल की छीलन हर दौर में पैदा होती रहेगी।वोह वक़्त को उधेड़ेगी और फिर रफ्फू करेगी।एक बेहतरीन लिखने वाला सिर्फ अल्फ़ाज़ का गुच्छा नही पेश करता है बल्कि वोह नज़रिया पैदा करता है।अगर ज़माने ने उसके नज़रिये पर मोहर लगा दी तो वह ऊँचा उठ जाएगा और अगर ज़माना उसके नज़रिये से बिदक उठा तो वह और ऊँचे उठेगा।

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