एक क़ौम का लीडर बनना हमेशा आसान रहा है।एक सम्प्रदाय को थामकर एक ऊँचाई तक बड़ी आसानी से चढ़ा जा सकता है।एक जाति के दामन को पकड़ कर खुद को स्थापित करना कोई कठिन कार्य नही है।एक धर्म की भावनाओ पर पैर रखकर अपने कद को ऊँचा करते बहुत से हल्के इंसानों को देखा है।यह गलत भी नही है, आसान रास्ता चुनने को भला कोई गलत कैसे कह सकता है।
अब रही बात सबको साथ लेकर चलने की तो उसके लिए जिगरा चाहिए।उसके लिए सब्र चाहिए।उसके लिए त्याग चाहिए जो सबमें नही होता इसलिए वोह अपनी क्षमता अनुसार एक सम्प्रदाय या क़ौम को पकड़ कर आगे बढ़ जाते हैं।
यह जो एक धर्म या क़ौम के लीडर होते हैं, यह चाहते हैं की उनका पूरा सम्प्रदाय उनकी आवाज़ पर उठ खड़ा हो,जो न उठे उसे पाएँ तो हमेशा के लिए उठा दिया जाए।यह वोह लोग हैं जो चाहते हैं की उनकी क़ौम और उनके धर्म में थोक के भाव बच्चे पैदा हों,क्योंकि उनकी मज़बूती गिनती से है।उन्हें बड़े अच्छे से पता है चाहे ख़ाली पेट हो या भरा,चाहे अनपढ़ हो या जाहिल,चाहे तन्दुरुस्त हो या कुपोषण का मरीज़,है तो वोट।उनका वोट।उनका अपना वोट।उन्हें परिवार की गुणवत्ता से कोई लेना देना नही,उनके लिए तो संख्या मायने रखती है।इसीलिए वोह संख्याबल पर ज़ोर देते हैं।
यह छोटे बड़े सम्प्रदाय,धर्म,क़ौम के लीडर खुद को शेर से मिलाते हैं, क्योंकि शेर किसी को भी खा सकता है।उनके मानने वाले भूल जाते हैं की जब यह शेर भूखा होगा तब।अभी तो शेर के मुँह से बचे गोश्त के लोथड़ों पर मौज हो जा रही है मगर जब शिकार नही होगा,तब तुम उसकी ख़ुराक बनोगे।यही तुम्हारे साथी बाराती तुम्हारे लोथड़े से अपनी भूख मिटाएंगे जब तक खुद लोथड़ा न बन जाएँ।
वैसे मैं यह भी बुरा नही मानता हूँ।अपनी क्षमता देखो,अगर वोह सबको साथ लेकर चलने के लायक न हो तो एक गुट को पकड़ लो और बढ़ जाओ।मसला रेस ही तो जीतने का है।तेज़ी से एक धर्म,एक क़ौम को पकड़ कर अपने निर्धारित लक्ष्य को पा लो।बाकि जिन्हें रेस नही जीतनी है, वोह सबको पकड़े।सबको लेकर चलें।उनकी चाल धीमी होगी,उनके चलने पर इलज़ाम।लगेंगे।कोई उन्हें कामचोर कहेगा,कोई उन्हें बेवक़ूफ़ कहेगा,कोई उन्हें क़ौम का गद्दार कहेगा।कोई उन्हें विभीषण कहेगा,मगर उन्हें चलना होगा।उस परिवार के माँ बाप की तरह जो अपनी चारों संतानो को खाना देना चाहता है, जो उनमे से बीमार एक बच्चे की ज़्यादा फ़िक्र करते हैं।वह चाहें तो अपनी सारी ऊर्जा एक बच्चे में लगाकर उसे स्थापित करदे मगर नही।वह माँ बाप हैं।उन्हें अपनी हर सन्तान प्रिय है।
रास्ते बड़े साफ़ हैं, जिन्ना ने भी अपनी क्षमता को पहचानकर एक क़ौम का ठेका उठाया था,उसे भी पता था की उसमे क़ुव्वत ही नही सबको साथ लेकर चलने की।यहाँ भी बहुतों ने एक धर्म का ठेका उठाया था,उन्हें भी पता था की वोह सबको साथ लेकर चलने के लायक नही।आज भी बहुत से लोग एक धर्म,एक जाति, एक सम्प्रदाय,एक क़ौम के सर्वेसर्वा बड़ी आसानी से बन जाते हैं।हद तो यह है मात्र एक ट्वीट से लाखों के फालोवर बटोर लेते हैं, मात्र अपने विरोधी पर एक ज़हर उगलती पोस्ट से क़ौम के सर परस्त हो जाते हैं मगर मेरी नज़र में इनका चोटी का लीडर भी, सबको साथ लेकर,सबसे पीछे चलने वालों के कद के आसपास नही ठहरता।
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