एक बार एक ज़मींदार की अपने इलाके में बड़ी किरकिरी हो गई।गाँव वालों में उनके खिलाफ हल्की हल्की सुगबुगाहट होने लगी।गाँव मिली जुली आबादी का था।ज़मीदार पर मुस्लिम परस्त होने का आरोप लगा।उनके मुकाबले दूसरे छोटे ज़मीदार थे,जिनकी हर क़ौम में बराबर की पकड़ थी मगर उनका साथ नही मिलता था।इसलिए बड़े ज़मीदार का एकछत्र राज था।जब उनके खिलाफ माहौल बनना शुरू किया और लोग नाराज़गी में हालत में छोटे ज़मीदार की हल्की हल्की तारीफ़ करने लगे।
तब बड़े ज़मीदार का माथा ठनका।बड़ी जुगत भिड़ाकर उन्होंने अपने साथ के एक हिन्दू साथी को शाम को खुदपर भड़कने को कहा।वोह वही शाम चीखने चिल्लाने लगा की उसके साथ बड़े ज़मीदार ठीक नही कर रहे हैं।एक बड़े तबक़े में उसके लिए माहौल बनना शुरू हुआ,तभी ज़मीदार ने अपने एक छोटे मुस्लिम प्यादे से कहा की जाओ और उसे खूब बुरा बुरा कहकर कोसो।उसने दूसरे व्यक्ति को कोसना शुरू किया।इसका असर यह हुआ की हिन्दू नेता की आलोचना से उपजा असन्तोष बड़े ज़मीदार की जगह उस छोटे प्यादे की तरफ चला गया।अगली सुबह बड़े ज़मीदार ने उस हिन्दू नेता को अपने घर पर बुलाया और भरी अवाम में कहा की यह मेरे जिस्म का हिस्सा हैं।
मैं इनके लिए सबकुछ छोड़ सकता हूँ।बड़े सख़्त अंदाज़ के बाद उस छोटे मुस्लिम प्यादे को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।पूरी अवाम खुश,बड़े ज़मीदार पर से मुस्लिम परस्त का दाग़ हटा,नाराज़गी खत्म हुई और फिर एक छत्र राज की उम्मीद जगी।वही शाम उनके हिन्दू साथी ने कहा चलो काफी कुछ तो सध गया बस जो वास्तव में नाराज़ हैं वोह कहीं छोटे ज़मीदार की तरफ न चले जाएँ।छोटे ज़मीदार के अपने लोग और यह नाराज़ लोग मिलकर सारा गणित बिगाड़ सकते हैं।तब ज़मीदार ने कहा ऐसा नही होगा।वोह जिसे निकाला है वोह हमारे हिस्से के नाराज़ लोगों को अपने साथ कर लेगा।उनमे से एक भी छिटक कर छोटे के पास नही जाएगा।तुम भूल गए जब हमने तुमने साथ में मिलकर ज़मीदारी शुरू की थी तो यही हालात तो थे।तब हमने नाराज़ लोगों को बड़े ताल्लुकदार के पास नही जाने दिया था।वही बड़े ताल्लुकदार तो आज तुम्हारे छोटे ज़मीदार हैं।हाहाहाहा।
जाओ और उस बेचारे को दो झोले दे आओ ताकि वोह कल कुछ लोगों को इकट्ठा कर सके।अपने दिल से निकाला है सियासत से थोड़े ही।बड़े ज़मीदार मुस्कुराते रहे और बोलते रहे ताउम्र यह लोग यह नही जान पाएँगे की उनका कौन है और कौन नही।सियासत को समझने केलिए दो आँखे काम नही आती।दो कान काम नही आते।एक ज़ुबान बेबस होती है।सियासत को समझने के लिए सियासी दिमाग चाहिए जो जज़्बाती लोगों के पास फटक कर भी नही आएगा।जाओ दोस्त छोटे ज़मीदार के दरवाज़े एक पटाखा दागे जाना ताकि लोगों को लग जाए की हमारी टूटन से वोह खुश हैं।आखिर यह दांव भी तो काम का है।
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