बहुत लोग एक ज़बान में कह देते हैं सच बोला करो।हमेशा सच बोलो।बात अच्छी भी लगती है।सच कहना ही चाहिए मगर कौन सा सच।सम्पूर्ण सच या केवल सच।बड़ी अजीब बात है न।बहुत बार जब हम सच बोलने चलते हैं तो हमारा ही सच बाहर नही आता है, हमारे साथ जुड़े बहुतों का सच बाहर आ जाता है।
कल एक फ़्रांसिसी बच्चे की कहानी पढ़ रहे थे।जिसको उसका बाप पीट रहा था की सच बोला करो,उसने कुछ झूठ बोला था।वोह रो रहा था,पूरा घर उसके पीछे सच बोलने पर अड़ा था।वोह बच्चा रोते हुए अपनी एक डायरी लाता है और कहता है यह लीजिये।इसमें मेरा पूरा सच लिखा है।इसमें लिखा है की कैसे अंकल पिंटो ने मेरे मुँह में खींचकर अपना मोटा भारी लिंग डाला था।मेरी साँस रुक गई थी पापा।मैं चीखता रहा मगर क्या मैं यह सच कह सकता हूँ।वोह तो पॉलिटिशियन हैं।पापा आपने कैसे दादी से छुपाकर मुझे दो अण्डे खिलाए थे,वोह भी लिखा है।इसमें बहुत कुछ है जो मैं सच सच बाहर कहूँ तो बहुत कुछ बदल जाएगा।वह लड़का फिर मार खाता है की दफ़ा हो जाओ अपनी मनहूस डायरी लेकर।लड़का बुदबुदाता हुआ जाता है, यही सच है की सच उतनी देर अच्छा लगता है जितनी देर वोह छोटी मोटी गलतियों तक सिमित होता है।सच सुविधा के हिसाब से चलता है।
खैर कहानी लम्बी थी मगर मैं सोचने लगा की क्या वाक़ई एक इंसान का सच,दूसरे इंसान के कपड़े उतार सकता है।और अगर ऐसा है तो क्या यह सच बोला जाना चाहिए।मैं ठिठक गया की अगर कोई तवायफ अपनी चौखट पर खड़ी होकर सच बोलने लगे तो कितने घरों में दरार आ जाए।मदरसों,मठो,संघो के बच्चे अगर सच बोल दें तो दीवारें चटख जाएँ।कोई चपरासी सम्पूर्ण सच बोलने लगे तो कितने अफसरों के कपड़े तंग हो जाए।कोई नर्स अगर चीखकर सच बोलदे तो कितने डॉक्टरों की इज़्ज़त पनारे से बह जाए।
खैर मुझे भी एहसास है इसलिए सच उतना ही बोलना चाहिए जितना खुद से ताल्लुक़ हो।जो सच किसी दूसरे से जुड़ा हो,उसे इग्नोर करना ही आदर्श स्थिति है।यहाँ तक हमारे हमारे मंत्रालयों में भी कुछ चीजों को गुप्त रखा जाता है, उनके बारे में सच नही बोला जाता।सेना के लिए भी बहुत बार सच नही बोला जाता।दो देशो की कूटनीतिक सम्बन्धो पर भी सच नही बोला जाता।पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी जी के जीवन का भी सच बाहर आने नही दिया जा रहा।पता नही किस हाल में हैं, कैसे हैं, कोई सच नही बताना चाहता।
खैर आप भी सुविधा के हिसाब से सच बोला करिये।घर में अगर बहुत सच बोले तो बुआ के खिलाफ बातें,चाचा के विरुद्ध षड्यंत्र,परिवार के बहुत से प्रोपगेंडे बाहर आने का खतरा रहेगा।इसलिए अपने विवेक से उतना ही सच बोलो जितना समाज पचा पाए।समाज की पाचन क्रिया बहुत खराब है।जहाँ,जिस सच से वोह कटघरे में आने लगेगा,वहीं यह सच पागलपन के दौरे में तब्दील कर दिया जाएगा।अब देखिये यहाँ एक स्टोरी में बच्चे का लिखा सच ही बहुतों को नही पचेगा।
सच बोलना तो एकबार फिर सबको भा सकता है मगर सच सुनना तो बहुत दूर की कौड़ी है।मेरे चेहरे पर लम्बी मुस्कुराहट दौड़ जाती है जब कोई कहता है मुझे सिर्फ सच पसन्द है।मैं सिर्फ सच बोलता हूँ।जी चाहता है गुज़री रात का हाल पूछ लूँ मगर छोड़ो, भरम भी बना रहना चाहिए।यह भरम बहुतों को आदर्श इंसान बनाए हुए है।यह भरम ही तो समाज को चला रहा है।यह भरम ही तो एक तार से समाज को जोड़े है।यह सच एक भरम ही तो है।आइये चलें उतना सच बोले,जितने से आदर्शवाद का भरम बना रहे।
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