Tuesday, May 2, 2017

सिर्फ तुम

अब तुमसे क्या छुपाना,जब तुम पर्दे की आड़ से मेरे नज़दीक़ आ रही होती हो तो मैं पहले ही जान जाता हूँ।मेरे हाथ तुम्हे पकड़ने को मचल उठते हैं और होंठ लरज़ जाते हैं तुम्हे छूने को।मैं बहुत कोशिश करता हूँ की तुम्हे चाहन कही मेरी लापरवाही से भौंडापन न हो जाए।हमारे अपनों के बीच तुम्हारे होने से मेरी तड़प का अंदाज़ा आम न हो जाए।यह सच है बहुत से लोग मेरे दरमियान तसव्वुर भी नही कर सकते की मैं किसी को इस क़दर चाहता हूँ।उन्हें पता है मुझमे मोहब्बत तो है मगर उसका रूप तुम नही हो।

मैं कैसे कह दूँ जब तुम गर्मी में मुझे देख अपना रँग बदलती हो तो मुझपर एक अजब सा जादू छा जाता है।तुम्हारे गुस्से से जो पसीने की बूँद एक गहरे रँग की तड़प दिखाती है दरअसल वही तो मेरी मोहब्बत की वजह है।मैं चाहता हूँ की तुम मेरे नज़दीक़ होकर भी नज़दीक़ न हो जिससे एक पीड़ा में तुम लगातार जलकर कुछ कम रह जाओ।तुम्हारा रँग गहरा हो जाए।तुम्हारा वजूद कम हो जाए।तुम जम जाने की हद तक जल जाओ।यक़ीन जानो तुम्हारे इस रूप को देखने,महसूस करने के लिए मैं सैकड़ो सुबहों को कुर्बान कर सकता हूँ।मुझे तुम एक और वजह से बेहद पसन्द हो।

मुझे पता है की सिर्फ तुम हो जो सबको अपने अंदर समेट कर सिर्फ अपने  जैसा बना लेती हो।तुम सैकड़ो की मिठास,हज़ारों के गोरे रँग,लाखों  बेरंग को मिलाकर जब तुम आतिश के ऊपर चढ़कर उबाल मारती हो,उस वक़्त तुम्हे एक झटके में होंठ पर लगा लेने को जी करता है।तुम मेरे सब्र का बड़ा इम्तेहान लेती हो ए मेरी चाय।तुमसे बहुत से लोग जलते होंगे मगर कोई कुछ नही कर सकता।क्योंकि ऐ मेरी मोहब्बत,मेरी चाय तुम मेरे लिए इस क़दर उबलकर,जलकर अपना वजूद खत्म करके आती हो,वोह कोई नही कर सकता।तुम्हे पता है की जब मैं तुम्हे छूता हूँ तो सब भूल जाता हूँ।जब तुम मेरे होंठ पर आती हो तो पूरी क़ायनात मेरे पाँव के नीचे होती है।

No comments:

Post a Comment