Wednesday, May 31, 2017

हरबर्ट मारक्यूज़ की क्राँति

हरबर्ट मारक्यूज़ क्राँति को लेकर बहुत कुछ लिख चुके हैं।जनता से असन्तोष को भी शब्द दे चुके मगर उन्हें लगता है कोई भी अन्याय के खिलाफ केवल युवाओं द्वारा ही अब बदलाव हो सकता है।मुझे नही लगता मारक्यूज़ ने साठ के दशक में सारी ज़िम्मेदारी क्यों युवाओं पर डालकर बड़ी आबादी को सरका दिया।अमेरिका को ध्यान में रखकर हो सकता है उनकी"वन डाइमेंशिनल मैन" बहुत हद तक खरी उतरे।वोह ऐसे युवाओं को देख रहे थे जो धर्म,जाति के विरुद्ध अपने भविष्य के लिए सामूहिक रूप से क्राँति करेंगे,जो कोई दूसरा वर्ग नही कर सकता।

खैर मारक्यूज़ की हमारे आँगन में ज़रूरत ही क्या है।हमारे युवा बहुत समझदार हैं।उसे नौकरी,भविष्य से क्या लेना देना।नौकरी वादों में निकलती है और अखबारों में भर जाती है।भविष्य तो जब तोता बता दे तो काहे की मेहनत।मुझे यह क्राँति शब्द ही खटकने लगा है।बेचारे कितने युवा इस क्राँति की बाट जोहते जोहते शून्य हो गए।

मैं कहता हूँ कोई भी चीज़ के प्रति तब तक असन्तोष नही पनप सकता जब तक केवल दो वर्ग सीधे न रह जाए।उच्च वर्ग की सत्ता के विरुद्ध निम्न वर्ग खड़ा होता आया है मगर हमने इससे निपटने के लिए एक बहुत बड़ी ढाल बना रखी है।उसे कहते हैं मध्यम वर्ग।यह वर्ग हर तरह के असन्तोष और खुशहाली को सोखकर बढ़ता ही जा रहा है।भारत में तब तक अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध कोई नही लड़ सकता जब तक यह वर्ग है।छोटी छोटी क्राँति को बड़ी क्राँति को कहा नही जा सकता।

हाँ तो बात कर रहे थे युवाओं की,देखिये बहक गए,जैसे युवा बहक जाते हैं।ऐसा नही है की युवा किसी काम के नही।इधर पिछले दिनों जितना कुछ हुआ है उसमे युवाओं का बड़ा हाथ है।हर दँगे को उठाकर देख लीजिये,युवा ही तो जोश से लबरेज़ दिखेगा।ट्रॉलिंग में भी तो युवा ही है।मारक्यूज़ कहते हैं युवा क्राँति करेंगे,वैज्ञानिक सोच के लिए,हम कहते हैं आजकल धार्मिक सोच से निपटने के बाद मौका मिल जाए तो डार्विन,न्यूटन को भी देख लेंगे।मारक्यूज़ खुद सर पीट लेते या अपनी किताब के पन्ने फाड़कर नाव बनाकर पानी में चलाते अगर एक बार यहाँ झाँक लेते।
यहाँ हर धर्म का युवा धर्म की ध्वजा लिए उसी को गुड़ और राब बनाने में लगा है।हाँ कभी कभी जोश मारता है जैसे निर्भया केस में मारा था।इण्डिया अगेंस्ट करप्शन में जोश में था।मगर इतना समझ लो जब कोई आंदोलन फैशन बनेगा तभी हमारा युवा बाहर निकलेगा।

रोज़गार गिर रहा है, काहे की चिंता।अपराध बढ़ रहे हैं, तो क्या करें।बच्चियों के बलात्कार हो रहें,तो क्या अब रोज़ रोज़ निर्भया जैसे निकलें।अब नही निकलेंगे।सुक़ून की रोटी खाने दो क्राँति कपूर।खैर मारक्यूज़ को पढ़कर लगा की इनकी क्राँति तो न हो पाएगी।बल्कि यह होते तो इनके हाथ काटने की क्राँति बड़ी आसानी से हो जाती।हमारे युवा तलवार चलाने में बड़े माहिर हैं मिस्टर मारक्यूज़।बराबर से हाथ की पाँच उँगलियों को तीन और दो में बाँटना जानते हैं।

वैसे इतना भी बुरा नही है।हमारे बहुत से युवा बहुत बेहतर काम कर रहे हैं।बस सधे हुए तरीके से आगे बढ़ने के लिए खूब पढ़ लीजिये।ताकि जो चिराग लेकर चले हो वोह लाखों चिराग में बदल सके।यह अकेले अकेले नायकत्व को बड़ी आसानी से खत्म किया जा सकता है।मारक्यूज़,फेनिन सब बैठे हैं, इंतज़ार में कब कोई उनकी सैकड़ों पेज की किताब से अपने सुनहरे भविष्य की चाभी ढूंढेगा।फुर्सत न हो तो हमारे पास आ जाओ,चाय पिलाओ,हम सब बता देंगे।कमबख्त चाय ने भी बड़ी क्रांतियों को घुलनशील बना दिया है।

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