Tuesday, May 16, 2017

नफ़रत तब से अब तक

करीब 70 साल पहले दंगो में मारे गए शम्भू को 2017 में पृथ्वी पर एक दिन फिर गुज़ारने का मौका ईश्वर ने दिया।शम्भू की ख़ुशी का कोई ठिकाना नही की बड़े अरसे बाद क़स्बे के पलंगों पर बैठे अपनों की औलादों से मिलेंगे।मांटी की खुशबु को महसूस करेंगे।वोह खिन्नी का पेड़ कितना बड़ा हो गया होगा जो मरने से चार घण्टे पहले रोपा था।झट से शम्भू पहुँचे अपने क़स्बे।यह क्या क़स्बा तो शहर में बदल गया।ऊँची ऊँची इमारते।बड़ा सा अस्पताल देख उसे आँसू आ गए।काश उस वक़्त ये होता तो शहर जाते जाते रास्ते में ना मरते।खैर उन्होंने बाज़ार का रुख़ किया।शम्भू को आज भी सब्ज़ी लेना सबसे पसन्दीदा काम लगता था।फौरन सब्ज़ी मण्डी पहुँच गया।सैकड़ो दुकाने देख चौंधया गया।फिर एक बड़ी दुकान देख पूछा यह कद्दू कैसे दिया।

दुकानदार ने उसे घूरा, यह लौकी है।हैं लौकी मेरे ज़माने में तो लम्बी होती थी।अच्छा यह वाली लौकी देदो।यह कद्दू है भय्या।क्या बात कर रहे हो कद्दू गोल होता है।अब लम्बा आता है भय्या।अच्छा सब्ज़ियों में यह अण्डे क्यों रखे हो।यह बैगन हैं।हैं बैगन सफ़ेद हो गए,हे राम यह है क्या।यह खरबूजा कैसे दिया।यह तरबूज़ है ऑस्ट्रेलियन।अब बकाओ मत तरबूज़ पीला कब हो गया।चचा कहा से आए हो।

यही से हैं ,बस बहुत दिन बाद बाजार आए।चचा बकाओ न कहो बहुत सालों बाद आए हैं।अच्छा यह क्या है।यह तरबूज़ हैं छोटे और लम्बे,खास माइक्रो फैमिली के लिए।शम्भू सोचे सब कितना बदल गया।शहर,सड़के,स्कूल, अस्पताल,सब्ज़ी,फल, मिठाई सब बदल गए।इतने में ज़ोर की आवाज़ हुई मुल्लों को मारो,खत्म करो,भगाओ।दूसरी तरफ से ज़ोर से आवाज़ आई ख़तम कर डालो काफिरों को।दुकानों के शटर गिरना शुरू,भगदड़,एक झुण्ड,दूसरा झुण्ड और पुलिस का सायरन।शम्भू को एक यही चीज़ पहचानी हुई मिली।70 साल पहले की वह नफ़रत जिसमें वह था।

वही बाजार जिसमे उस वक़्त वोह दँगे की भेंट चढ़ा था।सब्ज़ी ही तो लेने आया था,उसे क्या पता था की वोह सब्ज़ी ईश्वर के लिए खरीदने गया था।भिन्डी ही तो छाँट रहा था जब किसी ने पीछे से तलवार मारकर हरी भिन्डी को लाल कर दिया था।आज फिर,इतने अरसे बाद भी आज फिर वैसे ही मारे जाने से बस बच गया।वोह बड़बड़ाता हुआ आसमान की तरफ बढ़ गया...बड़े आए तरक्की करने वाले...खाली सब्ज़ी के रँग बदलें,कपड़े बदलें गाड़ी घोड़ा बदलें मगर दिमाग पहले से ज़्यादा बदबूदार और घिनौना है।यह 21वीं सदी के नौजवान हैं ,इनके दिल तो देखो हड़प्पा मोहनजोदड़ो से पुराने हैं।इनके दिमाग नफरत से बजबजा रहे हैं।इनको अपने हाथों,अपने जिस्म,अपने दिमाग पर रत्ती भर भरोसा नही तभी तो अपनी तरक्की में दूसरों को रोड़ा मानकर लड़ते रहतें हैं।कमबख्त आज भी वही नफ़रत,पिछड़े,घोंचू,दकियानूसी....मरो जाओ दफन हो जाओ।।।।

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