Thursday, May 18, 2017

गर्मी की छुट्टी और त्यौहार

कुम्भ शुरू होने वाला है।वोह संगम वाला नही बल्कि ग्रीष्मकालीन महा कुम्भ।ट्रेन,बस, टेम्पो सब गुलज़ार होंगे क्योंकि भारतीय बेटियों की पचास फीसद आबादी मायके की तरफ रुख करने वाली है।बच्चों के स्कूल बन्द और हिल स्टेशन के मानिंद ननिहाल चहकने को तैयार।अजीब सा है न सबकुछ।हम लोग किस क़दर त्यौहार के आदी हो गए हैं।हर चीज़ तय महीनो में,तय तरीके से निपटाना हमसे बेहतर कौन जानता है।हर तरफ ट्रेन में एक औरत कई बच्चों को लादे अपने नए नए कॉलर में कड़ी बकरम पड़ी शर्ट पहने हस्बेंड के साथ ससुराल को छोड़ राहत की साँस लेते जा रही है।

कई घरों में कई दर्जन बच्चों के आने से दीवारें असहज हो गई होंगी।दोपहर के खाने में खिचड़ी या तहरी ने कब्ज़ा कर लिया होगा,इतने लोगों के लिए इस भीषण गर्मी में रोटी कौन थोपे।ऊपर से सहनशीलता की मूर्ति हमारी बेटियां किसी भावज को इस गर्मी में चूल्हे में तपने तो न देंगी भले बातों से तपा रखें।सबसे ज़्यादा तो मज़ा चीकट क़िस्म के भाई को देखकर आता है।जो बहुत चाहकर भी इस त्यौहार से पीछा नही छुटा पाता।हमे तो लगता है यही वोह महीने हैं जिसमे सबसे ज़्यादा घरेलू परपंच पर चर्चा होती है।पूरे साल में भागी लड़कियों का हिसाब किताब होता है।लड़कियों के चक्कर वक़्क़र के किस्से निकलते हैं।भावज की चंटाइ को खुसुर फुसुर आवाज़ दी जाती है।

कुछ निरुपमा रॉय टाइप भावज पूरे साल का एक्सपायरी सामान इन्ही महीनो में सुआरत कराकर अपनी शाहखर्ची के झण्डे गाड़ती हैं।एक आध तो हद दर्जे चालाक होती हैं अपने हस्बेंड को बुरा,लापरवाह साबित करके खुद महा त्यागी बन जाती हैं।अच्छा इस महीने दामाद का मसीहा बनने का मौसम होता है।जो शराफत से बेटियों को उनके पुराने घोसले में लेकर आ जाए और पूरे महीने उसी घोसले के दाने खाता रहे वोह तो मसीहाई दामाद है।जो छोड़कर चला जाए,वोह गनीमत है।जो बीवी को जाने ही न दो,जाने अनजाने वोह राक्षस बन रहा होता है।ससुराल में उसका चरित्र उसके साढू भाई बड़े मज़े में हनते हैं।अच्छा कभी कभी हम साढू भाइयों को देखते हैं तो पाकिस्तान ध्यान आ जाता है।ज़मीन पर इकलौती प्रजाति है साढू जो आपस में ज़बरदस्त एकता का दिखावा करती है मगर दो साढू में ज़बरदस्त प्रतियोगिता रहती है की कब किसे ससुराल के कुरुक्षेत्र में पटका जाए।

खैर इस महीने अगर सफ़र में हों तो त्यौहार मनाने जाते परिवार को सहूलियत दीजिये,रास्ता दीजिये।बेटी का मायके प्रवास किसी त्यौहार से कम है क्या।घर की दीवारें बतयाने लगती हैं अपने बचपन के साथियों को देखकर।अच्छा ईश्वर भी बड़ा चंट है।इस भीड़ के लिए उसने थोक के भाव सस्ते और बड़े बड़े फल इस मौसम में उतारे।ताकि की चीकट से चीकट भाई भी अपनी बहन को तरबूज़ खिलाकर दिल में तरबूज़ के इतनी जगह बना सके।कुल मिलाकर जिसने इस ग्रीष्मकालीन महाकुम्भ का मज़ा नही लिया उसने इस भूमि पर जन्म ही क्यों लिया,ईश्वर जाने।चलो बहुतों को पुराना ज़ख्म भी लौटेगा इस गर्मी में तो बहुत से मामा बनने के सुअवसर भी पैदा होंगे।मज़े लीजिये गर्मी की छुट्टियों के,यह दुनिया के किसी कोने में नही मिलेंगी।खटमिट्ठे आँसू ही तो हमारी पहचान हैं।

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