मेरे नज़दीक़ कल से दो फैसले गुज़रे।एक निर्भया का और दूसरा बिलकीस का।अपने वक़्त के दोनों मशहूर कांड।दोनों से राजनैतिक भूचाल आया।एक ने मौजूदा सरकार की चूलें हिला कर तहस नहस कर दिया।एक ने मौजूद सरकार को और विराट बना दिया।मैं देखता रहा की एक ही हैवानियत किसी को राजनैतिक फायदा पहुँचा गई तो किसी की जड़ तक खोद गई।मैं दोनों फैसलों को पढ़ रहा था।एक अख़बार के अंदर के पन्नों में सिमटा था तो दूसरा पहले दो पन्नों पर चमक रहा था।एक में जज के उठाए हर लफ़्ज़ चस्पा थे तो एक में सिर्फ फैसला था।यह होना कोई बड़ी बात नही है।
ज़ाहिर है एक क्रिया की प्रतिक्रिया थी तो उसमे अपराध हल्का प्रतीत होता है।मगर दूसरा तो जघन्य अपराध था।बिलकीस के मामले में एक दिलचस्प चीज़ थी की उसकी बच्ची को उसके सामने पटक कर मारा गया।पूरा परिवार क़त्ल किया गया।उसका 5 महीने का गर्भ फाड़ दिया गया।उसका दसयों लोगो ने बलात्कार किया फिर मरा जानकर फ़ेंक दिया,जैसे बेचारी निर्भया को फेंका गया था।पुरुष के हर ज़ुल्म को इन दोनों ने सहा, फिरचला मुकदमो का दौर।एक में देश की मीडिया,सरकार,आम इंसान सब इंसाफ के लिए लड़ते गए जो कल अपने परिणाम को पहुँचा।दूसरे में सरकार समेत सब रोड़े अड़ाते रहे,यहाँ तक थक कर सुनवाई उस राज्य से बाहर की गई जो लम्बे वक़्त के बाद अपने फैसले पर पहुँचा।दोनों में सज़ा हुई।अब आते हैं मसले पर।बिलकीस जिसने सब सहा,उसने अंत में अपने अपराधियों के लिए फाँसी नही मांगी।मुझे पता है जब कोर्ट में उसके सामने उसका गर्भ फाड़ने वाले खड़े होंगे।बलात्कार करने वाले खड़े होंगे तब उसका दिल बदले के लिए तड़प रहा होगा मगर फिर भी उसने उनके लिए मौत नही माँगी।
यह बड़ी बात थी।दोनों मामले में कोर्ट की तारीफ़ की उसने न्याय किया।निर्भया केस में मैं महीनो ग़म और दहशत में रहा।दिल्ली में अनशन किया।भूखे पेट लड़ता रहा की इंसाफ चाहिए।बिलकीस के केस के वक़्त स्कूल में था।बुरा लगता था मगर ज़्यादा पता नही था।फिर तीस्ता से मिला और लम्बा दौर उनके साथ चला।खैर मैं सियासत में देखता रह गया की एक ही अपराध हमे बुलंद बना देता है और एक ही अपराध हमे नीचे ढकेल देता है।मैं फैसलों की जड़ में नही जाना चाहता बस इतना कहना चाहता हूँ की एक करिश्माई लीडर विपरीत परिस्थिति को भी अनुकूल बना लेता है और एक उसमे ढह जाता है।जिस लीडर को संवेदना बेचना आ गया उसे कोई फौरन तो नही हरा सकता।मैं बार बार कहता हूँ की सियासत करनी है तो सियासत सीखो।मुद्दों को मुनाफे में बदलने का हुनर सीखो।मैं जनता को कभी नही मानता की वोह दो आँखों के सिवा भी कुछ देख सकती है।वोह भीड़ है, सिर्फ भीड़।बस उसमे उतरने का हुनर सीखो।लोग तुम्हारे बताए मन्त्र को ही सच मानेंगे, तुम उनकी फ़िक्र मत करना।वोह खुद तुम्हारे समर्थन में ऐसे तर्क लाएँगे जो तुम्हे नही पता होंगे।इसलिए बस अपने दिमाग का भरपूर इस्तेमाल करो।
हाँ जो हमेशा नकारात्मक रहते हैं वोह सीखें की हमारे देश में कभी न कभी तो न्याय मिलेगा ही।
हर अपराध का हिसाब किताब होगा।अगर इसी भूमि में अन्याय हुआ है तो यही भूमि न्याय दिलाएगी।तुमको फ़ख्र होना चाहिए की देश ने दोनों फैसले खुले दिल से स्वीकारें हैं।अभी हमारे देश की आँख में इतना पानी है की उसे बिलकीस से उतनी ही मोहब्बत है जितनी निर्भया से,यहाँ की अवाम दोनों के अपराधियो को सज़ा पाने पर खुश है।बस ज़रा वोह यह तय करले की इन दोनों के अपराधी हमारे अपने घरों में न पैदा हों।हमारे घर का बेटा किसी बेटी का बलात्कार न करे न गर्भ फाड़े।हमारा बेटा अकेली औरत को अवसर न समझे।हमारा बेटा दंगो में जिस्म बांटकर खाने वाला न बन जाए।जिस दिन यह होगा उस दिन हर निर्भया और बिलकीस हमारे आँगन में बेख़ौफ़ मुस्कुराती रहेगी।
मुझे मेरी माटी पर फ़ख्र है की नाउम्मीदी का चाहे जो माहौल बनाए,चाहे जितना अपराधी बड़ा ताकतवर हो जाए।किसी मोड़ पर उसके गुनह उसके चेहरे को बदरंग ज़रूर करेंगे।तब उसके साथ कोई नही होगा सिवाए उसके गुनह के।यक़ीन न हो तो एक सैर जेल की कर आना।दँगाई,बलात्कारी,हत्यारे कोठरियों में अकेले सिसक रहे हैं और उन्हें इस्तेमाल करने वाले शानदार गाड़ियों में घूम रहे हैं।यह जान लो ख़ून जिसके हाथ में लगेगा,अपराधी वही है।बाकि सब निर्दोष।अपने को इस्तेमाल होने से बचो और शरीर के सबसे ऊपरी अंग का भरपूर इस्तेमाल करो।यह दिमाग तुम्हे सियासत की गुत्थियां सुलझाने में मदद करेगा और ऊँचा बढ़ाएगा।दोनों फैसलों ने देश को बेहद मज़बूत किया है, न्याय को सलाम।इनके लिए लड़ने वालों को सलाम।
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