मैं लिखना चाहता था की भीड़ के फैसलों पर लिखूँ।चौराहे पर इंसान के ख़ून से खेली जाने वाली होली लिखूँ।मैं यह भी चाहता था की आस्था के नामपर बेकसूर इंसानों को कुचलते पाँव को लिखूँ।मगर किसके लिए लिखूँ।जो इंसान हैं उन्हें तो यूँ भी यह बुरा लगेगा,जो वहशी हैं वोह इस सारे ख़ून के तर्क ढूंढ लाएँगे।जब हम उनके पड़ोस में किसी बेकसूर की नुचती खाल का ज़िक्र करेंगे तो वोह हमे कश्मीर में ले जाकर खड़ा कर देंगे।एक घटना को दूसरी घटना से सत्यापित किया जाएगा।एक से एक क़ाबिल,पढ़े लिखे लोग ख़ून की उठती फुहारों में अपनी आँख बन्द करके चेहरे को सामने करके ताज़गी महसूस कर रहे होंगे।
मुझे ज़रा भी हैरत नही,यह वोह लोग हैं जो घर में तलवार रखें हैं, हथियार रखें हैं।जानते हैं किसके लिए,अपने पड़ोसियों के लिए,वक़्त बेवक़्त उन्ही पर तो चलना है।इन्हें ज़बान से सेना पर भरोसा है मगर यह सच पता है की जब समाज के टुकड़े करने होंगे तो इनकी भुजाएँ ही काम आएँगी।मेरे बेहद करीबी दोस्त घरों में पीतल के हत्थे वाली तलवार रखें हैं।एक दिन हमने कह भी दिया दोस्त यह तलवार जिस दिन हमारी गर्दन पर पड़ेगी उस दिन ही इसकी प्यास पूरी होगी।दोस्त ठिठक गया।ठिठकने से भला होता क्या है।सच तो यही है की तुम उस दिन का इंतज़ार कर रहे हो जिस दिन यह समाज राक्षसी रूप लेगा और तुम तलवार लिए धर्म की रक्षा करना।
मैं रोज़ होते अन्याय को देखता हूँ।चुप हो जाता हूँ।कभी सोचता था की करोणों की आबादी पर कुछ हज़ार लोग राज कैसे कर सकते थे।तब अब आँख से पर्दा हटता है की करोणों लोगो को यूँ मासूमो का मारा जाना बुरा तो लगता है मगर वोह कुछ कर ते नही,करें क्या बल्कि बुरा लगने के बावजूद उनका मौन समर्थन भी है।एक मामूली सा सड़क छाप नेता पूरी कालोनी को डराए रहता है तो ऐसे से क्या उम्मीद।
मैं कभी ऐसे प्रशासन को उत्तम नही कह सकता जिसमे बहुत से लोग डर डर कर जियें।दंगा, हत्या,लूट,भीड़ का ख़ून से खेलना यह सब शासन का फेलियर है।वोह सरकारें अपने कर्तव्य में फेल हैं जिनके सामने किसी मासूम को ज़िंदा जला दिया जाए।हर वोह आदमी इसमें बराबर का गुनहगार है जो ऐसी हत्याओं को मूक सहमति दे।जब ख़ून से लथपथ जिस्म देखता हूँ तो सोचता हूँ की तुम्हारे घरों में रसेदार आलू का रस ख़ून में क्यों नही बदल जाता।मुझे चिंता होती है की तुम इन सबके पीछे खड़े लोगों को माला भी पहनाते हो।उन्हें चुनते भी हो और मौत पर अफसोस भी करते हो।
रास्ते सिर्फ दो हैं अगर किसी मासूम की हत्या से वाक़ई दुःख होता है तो कहो की यह अधर्म है।अगर ख़ुशी होती है तो स्वीकार करो की इस हत्या में ख़ून बहाने में हमारा भी हाथ है।तुम सब अपने अपने धर्म की फ़िक्र में मेरे देश को भूल रहे हो।मेरा देश जो सबको मिलाकर एक हुआ था,उसको छिन्न भिन्न करने में लगे हो।यह समझ लेना मेरे देश की आत्मा को खत्म करने के लिए तुम्हे मेरा भी ख़ून अपने मुँह पर मलना होगा।तुम्हारे खूबसूरत चेहरे पर मेरा लाल ख़ून जब काला पड़ेगा,तब ही तो तुम्हारा असली चरित्र बाहर आएगा।अभी देर नही हुई है, ख़ून तुम्हारी चौखट तक पहुँचे उससे पहले उसे रोको।इसको चीखकर गलत कहो।इनको संरक्षण देने वालों के कॉलर नोच लो।इनके पीछे खड़े मुस्कुराते नेताओं की मुस्कान को मायूसी में बदल दो।वोह मायूस हो जाएँगे जब तुम कहोगे।हाँ हम एक हैं।हमारा देश एक है।माटी एक है।आत्मा एक है।यह भारत है, सबका भारत।
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