Wednesday, May 3, 2017

यह आँधियाँ

"भय्या ई अल्ला मियाँ को क्या हमसे लिल्लाही बैर है।"यह अल्फ़ाज़ सुबह सुबह गूँज गए।सफ़ाई वाली महिला चिल्ला रही थी अभी कल पूरे घर की धुलाई करी थी।मनहूस आँधी ने घर कल से ज़्यादा गन्दा कर दिया।कितनी मुश्किल से पोछा लगाया था सब तरफ सिर्फ धूल है।उधर कुछ बाग़ वाले मिलने आए भय्या सारा आम तो झड़ गया।यह आँधी हमारे आम तोड़ने ही आई थी क्या।खैर सब ख़फ़ा,सबके काम बिगड़ गए।मुझे लगा वाक़ई यह आँधी की ज़रूरत है क्या।कुछ झोपड़ी उड़ गई,कुछ पेड़ गिर गए,कुछ तार टूट गए।

एक ज़रा सी तेज़ हवा ने तिनका तिनका उड़ा डाला।बात गरीबो की नही है अमीर भी कल अपनी खिड़कियों के शीशे गिनते रहे की कितने बचे।उनके भी कुर्ते एक पड़ोस के यहाँ और पैजामे दूसरे मोहल्ले पहुँच गए।मैं सोचता रहा की यह आँधी किसको तबाह करने आई थी।किसी एक मज़हब को,किसी एक पार्टी को,किसी एक विचार को,किसी एक वर्ग को,आखिर किसे।कल उड़ती धूल तो हर आँख में जा रही थी।खैर जो हुआ सो हुआ।कल की आँधी से आज अपने काम करने वालों को अकेले मत निपटने दे।आज जब वोह सफ़ाई करें तो हाथ बटा लीजिये।अपनी खिड़की के टूटे शीशे से ज़्यादा उनके उड़े एक दुपट्टे की फ़िक्र ज़्यादा कीजिये।

यह आंधिया बेहद ज़रूरी हैं।यह धूल बिखेरती हैं मगर हमे इकट्ठा करती हैं।यह सलीम के घर की रेत मनीष के आँगन में उड़ेल देती हैं।जगजीवन के घर के पौधों के बीज को ज़ाकिर की क्यारी में रोप देती हैं।हर एक चीज़ के अपने अच्छे बुरे प्रभाव हैं।हाँ उन तुर्रम खाँ को भी देखना है जो कल आँधी में आँख खोले छत पर खड़े हुए होंगे।मैं फिर कह रहा हूँ जब इस क़दर तेज़ आँधी आए तो पहले आँखे बन्द करो और दिमाग को खुला रखो,ताकि इसके गुज़रने के बाद देख तो सको।यह सिर्फ धूल भरी आँधी की बात नही है।यह सियासी,वैचारिक आँधियों से लड़ने की भी युक्ति है।इतनी तेज़ आँधी को एक झटके में रोकना नामुमकिन है हाँ इसके फौरन बाद के काम को करना समझदार का कर्तव्य है।जब कोई गन्दी सियासी आँधी आए तो उससे आँख खोलकर मत लड़ना वरना आँखे बन्द हो जाएँगी।दिमाग खोलकर लड़ना।

जब यह आँखे रहेंगी तब ही कल काम कर पाओगे।अतिउत्साह में अंधे हो जाने का पूरा आदेशा रहेगा।अगर इतना ही उत्साह है तो आँधी आने से पहले सब तरफ इस क़दर पानी छिड़क दो की धूल उठने ही न पाए मगर मुझे पता है यह तुम्हारी क्षमता से बाहर की बात है।खैर छोड़ो आज बाग़ निकल जाओ और आम की कैरिया बटोरो।घर की धूल समेटो।दरवाज़े खिड़की पोछो।सब कुछ जो कलकी रात उजड़ा है उसे आज समेटो, उन्हें बना पाना तो हमारे बस का है नही क्योंकि टूटे आम को वापिस तो पेड़ में लगा नही सकते।इन आँधियो के कुछ परिणाम तो त्वरित हैं मगर कुछ बाद में आएँगे।मुझे भी अफसोस है की मेरा एक रुमाल जिसपर एक ये शेर लिखा था,उड़ गया।जाने किसके घर में कहर मचाएग......

मेरे इश्क़ से मिली है,
तेरे हुस्न को ये शौहरत।

तेरा ज़िक्र ही कहाँ था,
मेरी दीवानगी से पहले।।

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