अब क्या माँ पर भी लिखना होगा।कैसे लिखेंगे,क्या लिखेंगे।वह तकलीफ़ लिखें जो उनके पेट में पहली बार टांग मारने से हुई थी।उस दर्द को लिखें जो हमारे पैदा होने में उन्होंने सहा था।यार यह बताओ उस एहसास को कैसे लिखें जब वह पहली बार मुझे देख दर्द के साथ मुस्कुराई थीं।अपने बड़े से हाथ में मेरा पूरा बदन लेकर कहा था आज से मैं तेरा साया हूँ।कैसे लिखूँ उन उंगलियो पर जिन्होंने पूरे बदन पर ऐसे मालिश की मैं आजभी सख्त पत्थरों से जूझने लायक बना।
उस दूध पर लिखने की सलाहियत मुझमे नहीं।उन निवालों पर क्या लिखा जाए जो बिना मेरे भूख भूख पुकारे मेरे मुँह में अनगिनत बार डाल दिए गए।मैं या कोई भी माँ पर कैसे लिखे।आप और हम सारे एहसास,जज़्बात,मोहब्बत सब लिख सकते हैं मगर माँ पर कलम खुद बच्चा हो जाती है।हाँ एक बात जो मैं हमेशा सोचता हूँ वह यह की मेरी माँ मेरे सामने दुनिया छोड़े नाकि उसके सामने मैं।मरना सभी को है मगर मैं नही चाहता एक माँ अपने बेटे के मरने का दर्द सहे।यह पीड़ा उसके जीवन की सबसे घातक पीड़ा है।
हाँ मैं बेटा होकर उस दर्द को उठा लेना चाहता हूँ।मैं कोई अच्छा बेटा नही हूँ फिर भी मैं जब पैरों को दबा रहा होता हूँ तब ही दुनिया के सबसे ऊँचे शिखर को छूने का एहसास होता है।तकलीफ़ तब होती है जब देखता हूँ कोई नौजवान माँ को नासमझ समझ कर उन्हें दुत्कारता है।माँ का जिसके दिल में एहसास हो गया वह दूसरे को नुकसान तो नही ही पहुँच सकता।मैं क्या कहूँ यह उल्टा सीधा लिखते लिखते दिल भरने लगता है।माँ का एहसास लफ्ज़ से क्या लिखें दिल खुद उसकी गवाही दे रहा होगा।
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