Tuesday, May 30, 2017

सब्र रखो

आसमान ज़बरदस्त सुर्ख़ हो रहा था।सुर्खी कालेपन की हद तक बढ़ती ही जा रही थी।बहुत लोगों के इकट्ठे होने का एहसास हो रहा था।करीब से देखा तो एक बड़ी ग़मगीन महफ़िल जमा थी।दूर से उनके पाँव उनके ही आँसुओं से भीगे मालूम पड़ रहे की अचानक कोई सुर्ख़ लबादा ओढ़े हुए लम्बा सा क़द और मज़बूत बदन का साया दाख़िल हुआ, चेहरा ज़बरदस्त सूजा और आँखे महीनों की रोई मालूम पड़ती थी।ग़ौर से देखा तो गौतम बुद्ध थे।

पलके झुकाए सिसकते हुए सामने किसी से बात कर रहे "मै बेहद शर्मिंदा हूँ हमारे मानने वाले हमारी इज़्ज़त तार-तार कर रहे हैं, इंसान को इंसान से ऐसी नफ़रत की भूखे प्यासे समन्दर में भेड़ बकरियों की तरह निकाल दिया।मेरा दिल फट पड़ा देखकर।" सामने मुहम्मद साहब थे,बुद्ध को समझाते हुए बोले "एै बुद्ध मत रो, पता नहीं हमसे क्या कमी रह गई कि अपनी ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी इन्हें समझा न सके,आप ही अकेले नही हैं, मेरे मानने वाले जब किसी का भी ख़ून बहाते हैं तो लगता है जैसे मेरे दिल को पाँव रखकर मसल दिया हो।मेरी आँखे तड़प कर ख़ून के आँसू से तर हो जाती हैं।"

इतने में ईसा ने बात काटते हुए कहा "तुम दोनों को पता है राम भी बेहद मायूस हैं,उधर बैठे हैं सर झुकाए।बहुत कहा की अरे हम एक दूसरे को समझतें हैं।आइये हम तो मिल लें, तो राम शर्मिंदगी के में कह रहे थे की "मेरी पलके ही नही उठ रहीं।मैं कैसे बुद्ध और मोहम्मद के सामने खड़े होकर बात करूँगा।मेरा ह्रदय तो विशाल था मगर मेरे मानने वालों ने उसे इतना संकुचित कर दिया की उसमे अब मैं रह ही नही गया।आप सब तो फिर भी बच जा रहे,यहाँ तो मेरा नाम लेकर ही मेरी सीख को तार तार किया जा रहा है।"

ईसा सब तरफ होकर लौटे,हमारी महफ़िल में बैठे सभी यहाँ तक मूसा भी आज आपस में आँखे नहीं मिला पा रहे।गुरु नानक,महावीर,दाऊद सब अलग अलग बैठे हैं।उनके दिल है की तड़प कर एक दूसरे को गले लगा लें मगर क्या करें जब पाँव के नीचे अपनों को देखते हैं तो ठिठक जा रहें हैं।मै ख़ुद इस हद तक शर्मिंदा हूँ कि इस महफ़िल में बैठने कि ताकत नहीं जुटा पा रहा हूँ। कहाँ जाऊँ? ज़मीन हमारी हो न सकी, आसमान हमें रास न आया।वोह हमे ज़बानों से हाथ तक ही तो ला सके,दिल में नही उतार पाए।दिल ही तो हमारा घर था जहाँ से हम बेघर हैं।

तभी तेज़ रोशनी की चमक के साथ ज़बरदस्त आवाज़ आई"तुम लोग मायूस मत हो, तुमने जो सबक दिया वो मेरा सबक था, न मै मिट सकता हूँ , न मेरा सबक, मेरे बहुत से ख़िदमतग़ार अभी भी ज़मीन पर मौजूद हैं, वो ख़ुद मिट जाएंगे मगर इंसानियत का परचम बुलंद रखेंगे,मैं इन सेवको को इस धरती पर कभी खत्म नही होने दूँगा।लाख बुरे पर मेरा यह एक सेवक भारी होगा।वोह मिट जाएगा मगर तुम्हारे सबक से पीछे नही हटेगा।तुम देखना उसका ह्रदय तुम्हारे जितना ही विशाल होगा।जो सबकुछ बर्दाश्त करते हुए इस ज़मीन को सुंदर बनाने के लिए अंत तक लगा रहेगा।बस तुम सब्र रखो""

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