Monday, May 15, 2017

बड़ा मंगल

मैं चाहता तो बेगम की मन्नत और ख्वाहिश से चले बड़े मंगल की गंगा जमुनी तहज़ीब पर बात करता।लखनऊ के सबसे प्राचीन हनुमान मन्दिर पर लगे चाँद तारे का ज़िक्र करता।नवाबी हुकूमत से लड्डू के थालों और शरबत के मटकों का ज़िक्र करता जो सुनहरी चादर ओढ़कर हनुमान मन्दिर तक जाते।जेठ के बड़े मंगल की बड़ी खासियत को उभार सकता मगर क्यों उभारु?

हमेशा इतिहास को देखकर मुतमइन नही हुआ जा सकता।वोह अवध की बेगम थी जो हनुमान जी को दिल से दिल दे बैठी।वोह नवाब ए वक़्त थे जो उनकी ख्वाहिश को हुक्म समझ मन्दिर की तामीर और रवायत को अवध का जश्न बना गए।वोह अवाम थी जिसके दिल गुलाब की तरह महकते थे।उनके दिलों में मोहबत थी।वोह मोहब्बत और भाईचारे से भरे दिल लगातार कम होते चले गए।तो जो वोह वक़्त बीत गया उसका ज़िक्र ही क्यों करें।

आज लखनऊ में हर तरफ भंडारे होंगे।हर इंसान चाहेगा की उसके स्टॉल से हर तरह के लोग प्रसाद चखें।जब वोह मेरे हनुमान जी की मूर्ति लगाकर शरबत बाँट रहा होगा तब उसका ह्रदय हनुमान जी जैसा विशाल होगा।वोह सबको सब कुछ दे देने पर आतुर होगा मगर जैसे ही प्रसाद खत्म वैसे ही दिल के द्वार छोटे हो जाएँगे।फिर उसे इंसान में फ़र्क दिखाई देगा।भंडारे पर खड़े रहते वक़्त उसे हर हाथ फैलाए हनुमान प्रेमी नज़र आएगा और वहाँ से उतरते ही उसे इन्ही इंसानों में हिन्दू,मुस्लिम,दलित,ब्राह्मण नज़र आने लगेगा।इसलिए मैं नवाबी दौर की शुरू की हुई इस परम्परा का कोई ज़िक्र नही करेंगे।हम तो आज देखेंगे और कल देखेंगे।जो बीत गया वोह सुनहरा वक़्त था।

जेठ की तपती दोपहरी जब तुम हनुमान जी के प्रसाद शरबत को बाँटना तो एक बार दिल में झाँकना,जो शरबत तुम्हारे दिल को तरावट नही दे सकता वोह मेरे हनुमान जी के नज़दीक़ भी नही पहुँचेगा।अगर तुम इंसान से इंसान में भेद करके,नफ़रत करके,उन्हें अलग समझकर चार लड्डू भी दोगे तो वोह मेरे हनुमान जी की पाँव तक भी नही पहुँचेंगे।आज जब तुम सफ़ेद लाल चादर पर गुलाब की पन्खुड़ियाँ बिखेर हनुमान जी को याद करना तो कोशिश करना की तुम्हारा ह्रदय भी विशाल हो,तुम्हारे सीने के अंदर भी सियाराम हों।तुम्हारा ह्रदय भी मानव मात्र के लिए मुलायम हो।

मैं लखनऊ को इसीलिए मोहब्बत करता हूँ की यह शहर चाहे जो हो जाए कम से कम गंगा जमुनी तहज़ीब को कायम तो किये हुए है।जिसे लगता है मैं कल्पना में उलझा हूँ वोह अलीगंज के प्राचीन मन्दिर चला जाए।देखे की परम्परा की खुशबू क्या होती है।खैर सभी बड़े मंगल हो सके तो दिल जोड़िये।यह लखनऊ की देन है की हम शकर के घोल से दिलों को एक करने की समझ रखते हैं।आज जब बड़ा मंगल मनाना तो कोशिश करना की हनुमान जी की उस परम्परा को कायम रखना।जैसे आज स्टॉल पर मोहब्बत से पेश आना वैसे ही ताउम्र पेश आना।यही हनुमान जी को दिल में उतारने का तरीका है।

मैं भी अलीगंज मन्दिर देर सबेर जाया करता हूँ।सिर्फ यह देखने की कैसे मेरा शहर मोहब्बत में जीता रहता है।कैसे हनुमान जी हमारे दिलों को मोहब्बत से भर देते हैं।कैसे हम बड़े मंगल को इंसान बन जाते हैं।बड़ा मंगल हमारे दिलों की उमंगे लेकर आता है।आज का शरबत हमारे दिल को इतनी तरावट देगा ही की कुछ वक़्त तक हम नफ़रत से तो दूर ही रहेंगे।आज जाना और बिना कुछ सोचे,सवाल किये,प्रसाद चखना,हनुमान जी हमारे दिलों को देखेंगे,यदि मोहब्बत होगी उसमे तो वोह वहीं रह जाएँगे ,जब तक मोहब्बत रहेगी......

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