Sunday, May 28, 2017

माहवारी

एक बारह तेरह साल की लड़की की माँ मर गई।पूरे परिवार में वोह,उसका बाप और भाई ही रह गए।माँ जो सबकी ज़रूरत थी,उस परिवार पर पहाड़ की तरह यह दुर्घटना घटी।हर एक ग़म में था।सब तरफ सब लोग उस लड़की को लेकर ज़्यादा ग़मज़दा थे।सबकी एक ही फ़िक्र की यह लड़की अब अपनी ज़रूरते किसे बताएगी।यह लड़की आने वाले वक़्त में अकेले माँ के कैसे जियेगी।कोई कहता बेचारी अब अपनी खास ज़रूरते किसे बताएगी,बाप भाई को तो बताएगी नही।

मैं सोचता रहता की आखिर वोह क्या खास ज़रूरत है जो एक बेटी बाप से नही बता सकती।वोह आखिर ऐसा क्या है जो बहन भाई से नही कह सकती।दिमाग यूँहीं उलझा रहता की बेचारी लड़किया कुछ चीज़ें हर किसी से नही कह सकती।मुझे वाक़ई नही समझ आता था की यह सगे रिश्तों में किस बात का पर्दा।छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के बीच काम करके लम्बे अरसे बाद पता चला की लड़कियों की दिक्कत क्या है।मैं तो हैरत में था की आदिवासियों की लड़कियों से लेकर हमारे घर की लड़कियों तक सब एक जैसी हैं।वोह आपस में कहीं मेल नही खाती मगर इसपर तो सब एक जैसी हैं।

हमारी पढ़ी लिखी सोसायटी और उनकी कुछ हद तक अनपढ़ सोसायटी के पुरुष भी एक जैसे ही हैं।उनके पिता और हमारे पिता समान हैं।कोयले में झुखे उनके भाई ऐसी में बैठे हमारे भाइयों जैसे ही इन विचारों से बंधे हैं।बल्कि कई जगह तो वोह हम सबसे बेहतर खुले मिजाज़ के मिले।वोह नही चाहते की उनकी लड़कियों,औरतों की इन ज़रूरतों पर बात हो।यहाँ पर हर धर्म,जाति,सम्प्रदाय सब एक हैं।कोई नही चाहता की औरतों की माहवारी पर बात हो।उनके इन खास दिनों को तवज्जो दी जाए।

मैं माहवारी के मेडिकल या शरीर विज्ञानं पर नही जाऊँगा।बस इतनी सी बात की इस टैबू को हटाइये।एक लड़की अपने बाप से माहवारी के बारे में क्यों नही कह सकती।भाई से क्यों नही बतला सकती।सेनेटरी पैड को अपराध की तरह क्यों छुपाना पड़ता है।किसी के तक़लीफ़ के वक़्त साथ की ज़रूरत होती है नाकि दुत्कारने की।हम नही कहते की आप सोफ़े पर बैठकर इसपर दिनभर चर्चा कीजिये मगर इसे इतना हल्का कर दीजिये जैसे टूथपेस्ट का घर में आना और सबका ब्रश करना।हम इनकी चर्चा नही करते और हर एक रोज़ यूज़ करता है।ऐसे ही माहवारी और उसकी ज़रूरतों को ज़िन्दगी में दाखिल करदें।कल कोई उस लड़की की तरह यह न कहे की बेचारी अब किस्से कहेगी।हर भाई,बाप,बहन,सब एक जैसे हैं।इनमे एक जैसा पर्दा है।एक जैसा खुलापन।

खैर अगर किसी भी धर्म को अगर महिलाओं ने बनाया होता तो धर्म में भी इसकी व्यवस्था होती।पुरुष तो प्रतिबन्ध लगाता ही है।सभी धर्मो ने इन दिनों पर कुछ न कुछ बंदिशे लगा रखी हैं।हो सके तो इससे पार जाइये।कुछ न भी हो तो कम से कम इसपर मज़ाक मत उड़ाइए।खुसुर फुसुर मत कीजिये।अपनी आँखों को इस हद तक बेहयायी से मत खोलिए की आपकी बहन को भी नज़रे झुका लेनी पड़ें।सबके लिए एक ऐसा माहौल बनाइये की हर एक ख़ुशी और ग़म को बिना छुपाए ज़िंदा रह सके।और हाँ यह करके हम कोई एहसान नही कर रहे होंगे।पिछली गलतियों को सुधार भर रहे होंगे।
#noshame #वह_सुर्ख़_सात_दिन #speakup

No comments:

Post a Comment