जब आपके मन का लिखा जाए।जब अपने सारे एहसास को छोड़कर सिर्फ आपके ख्याल रख कर लिखा जाए।जब आपकी भौंहे न तिरछी हों इस डर में कलम तिरछी कर दी जाए तो उसे ही गुलामी कहते हैं।अपने दोस्तों को न खोना हो इसके लिए कलम को रोक देना ही गुलामी है।तुम मेरे चन्द लफ्ज़ से उबल पड़ते हो और हम तुम्हारे दिल में अथाह उमड़ रही नफ़रत पर भी दिल लगाए बैठे हैं।मैं अपना लिखा देखता हूँ फिर तुम्हारे चेहरे का उतरा हुआ रँग देखता हूँ,कलम रोक देता हूँ ताकि तुम्हारे चेहरे की रंगत फीकी न हो।तुम्हे पता है की सिर्फ तुम्हारे दिल का ख्याल रख कर कलम को सैकड़ो बार रोका है,मालूम है की आने वाला वक़्त मुझे इसकी सज़ा देगा।तुम्हारी भावनाओ का ख्याल रखते रखते अपने दिल को इतना मार चुका हूँ की उससे अब लफ्ज़ भी नही फूटते।बहुतों का लिखा पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ लाओ लिख दूँ मगर तुम्हारी कयामत से डर जाता हूँ।मेरी बेबसी समझो।लोग कहते हैं आजकल तुम्हारे चेहरे पर मुर्दाहिन क्यों छाई है तो उन्हें कौन बताए इस पूरे जिस्म में अथाह विचार और शब्द ज़िंदा गाड़ दिए गए हैं।मैं सिसकती ज़िंदगियों पर कलम को चीर कर रख देना चाहता हूँ मगर फिर तुम्हारे काजल की बारीक़ नोक मेरे कलम की निब तोड़ देती है।इधर उधर का लिखने के बाद मैं शीशे में चेहरा नही देख पाता हूँ।बहुतों से बात नही कर पाता हूँ।एक डर है एक गुलामी है जो हमारे हर लिखे को मिटा देना चाहती है।कोई पूछता है वह जो लिखा था तो क्यों मिटा दिया।मैं सोचता हूँ उसे मेरा लिखा हुआ मिटता दिख रहा है मगर वह मेरा मिटना नही देख पा रहा।जिस वक़्त जी चाहता है उस औरत पर लिख दूँ जो जूतों से रौंदी जा रही हो तो फिर गुलामी जीत जाती है और मैं हार कर मुँह मोड़कर मुकेश के गाने सुनने लगता हूँ।रूह को लगता है काँटों पर से खींचा जा रहा है मगर कमबख्त यह ज़बान उसके दर्द में एक लफ्ज़ भी नही बोलती।तुम और मेरी ज़बान एक जैसे हो।मुझे पता है मुझे रोज़ मिटता देखते हुए तुमसे और इससे कभी कोई लफ्ज़ नही फूटेगा।ख़ून के आँसुओ से डबडबाई आँखों से बस यही सोचता हूँ की किसी की कलम को गुलाम मत बनाना।यह जिस्म की गुलामी से हज़ार दर्जे बुरा है।यह वह मौत है जो ईश्वर कभी नरक में भी नही देगा।मैं हरवक्त सवालिया आँखों से घिरा जवाब में तड़पता रहता हूँ।मैं और मेरी क़लम कोई भी पहले दम तोड़ दे तो कम से कम एक दिल की यह दर्दनाक मौत का मन्ज़र तो ठहरे।मुझे पता हैं तुम्हे यह लफ्ज़ भी बुरे ही लगेंगे और मुझे मजबूरी में हज़ार अल्फाज़ो से इन मामूली,दो कौड़ी के गुलामी एहसास पर मिटटी डालनी पड़ेगी।ठीक तुम जैसा कहो यह गुलाम कलम वैसा लिखेगी मेरे दोस्त। ©
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