Thursday, July 21, 2016

बेड नम्बर 23

अस्पताल में अपने सीरियस मरीज़ के साथ वक़्त काटना कितना मुश्किल है।सब बाहर इंतज़ार कर रहे हैं और मरीज़ अंदर सबका इंतज़ार।यह वह वक़्त है जब पूरा परिवार एक साथ इकट्ठे होकर परेशानी का मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है।उसी वक़्त वहीं से एक लाश को वार्ड ब्वॉय ले जा रहे हैं।उस गुज़रे हुए इंसान के साथ के लोग पीछे पीछे रोते बिलखते निकलते हैं।ऐसे में हमारे साथ के भी लोग रोने लगते हैं।मेरे अपने ऐसे रोते हैं जैसे कोई अपना निकल गया हो।इस तरह जितनी लाशें जाती हैं वह सब हमारे लोगों को रुलाती जाती हैं।इनकी चीखें, इनका सिसकना, इनकी टूटन हमें मज़हब,राज्य,जाति, दल को जाने बिना रुला देता है।जानते हैं यह कौन रुला रहा होता है।यह होती है संवेदना।जो हमे हमारे लेटे मरीज़ से जोड़कर ,उसे खोने का एहसास पैदा करती है।जाती हुई लाश हमे खोखला करके जा रही होती है।मेरे साथ मौजूद हर कोई, गुज़रती लाश पर या तो रो रहा था या आँखे चुराकर इधर उधर देख रहा था।यह एक अंजान डर होता है जो हमें रुलाता रहता है।अस्पताल हमे बहुत कुछ सिखाता है।ज़िन्दगी से लड़ना,ज़िन्दगी के लिए लड़ना दोनों चीज़ें सिखाता है।बगल के बेड पर मौजूद मरीज़ का दर्द दीखता है नाकी धर्म।डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर दिखता हैनाकी उसमे धर्म।जब परेशानी सर पर होती है तो लड़कपन के सारे चोचले अस्पताल के गेट के बाहर रह जाते हैं।ताउम्र कट्टर से कट्टर रहा आदमी अपने मरीज़ के लिए जब ख़ून ढूंढता है तब अपनी ज़बान की बनाई सारी सीमाए तोड़ देता है।तड़पते हुए मरीज़ के लिए दुआओं के बन्धन भी टूट जाते हैं।मैं अस्पताल के एक कोने में खड़ा दूर से मायूस से इंसान को देखता हूँ।दीवार से सर लगाए अपने मरीज़ के साथ सामने वाले के लिए भी दुआ खुद बखुद निकल जाती है।पड़ोस के वार्ड में झांकता हूँ तो देखता हूँ एक हनी सिंह टाइप नौजवान किसी बूढ़े की पेशाब की थैली बदल रहा है।यह वह दृश्य था जो हमे एहसास कराता है की दर्द और ज़िम्मेदारी क्या होती है।दूसरे बेड पर बैठे उस अधेड़ को भी देखता हूँ जो शायद पत्नी पर रोज़ रौब गांठता रहा होगा मगर आज मासूम बच्चे की तरह उसके हाथ से दाल पी रहा है।यह जो अस्पताल है न यह मुझे बहुत उम्मीद देता है।यहाँ पर निकली लाश से लोग बिना कर्मकांड की परवाह किये उससे लिपट कर रो लेते हैं।
यहीं पर किसी का घर बिखरता है तो किसी का बचता है।यहीं हरे पर्दों और सफेद चादरों में पता चलता है की यह जो लेटा है यह कितना ज़रूरी इंसान है।जिसको मुँह ढके रोते हुए लोग ले जा रहे हैं, पता चलता है की यह परिवार की रीढ़ था।जो एक पल में सर कलम कर डालते हैं मेरी समझ से उन्हें अस्पताल में एक महीने सिर्फ खड़ा रखा जाए।तब वह दर्द को देख पाएँगे।एक ज़िन्दगी की अहमियत समझ पाएँगे।मैं अपने मरीज़ को अकेला छोड़ अक्सर अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठा सोचता रहता हूँ की यह क्या है जो सब जगह है मगर इस अस्पताल के गेट के अंदर नही है।नफ़रत गेट के बाहर खड़ी है और मैं अंदर खड़ा,एक दूसरे को सवालिया निशान से देख रहा हूँ।एक ही वार्ड में दँगे में ज़ख़्मी मरीज़ भी है और उसी में दँगे करने वाले की माँ भी लेटी है।है न संयोग।मैं देख पा रहा हूँ दर्द हमे कैसे जोड़ता है।तक़लीफ़ हमे कैसे संगठित करती है।चोट हमें कैसे एक करती है।मैं आजकल अस्पताल से बहुत कुछ सीख रहा हूँ।बस यही दुआ की आपको सीखने के लिए वहाँ न जाना पड़े जहाँ ज़िन्दगी का हेड-टेल सेकेंडो में हो रहा हो। ©

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