Tuesday, July 5, 2016

खब्त

पता नही वह कौन सी खब्त है की टूथ ब्रश चाहे जितना खराब हो जाए बदलने का दिल नही करता।नया इस्तेमाल करने के बावजूद पुराने वाले को फेंकने का दिल नही करता।क़लम की रिफिल खत्म हो जाए या वह बेकार हो जाए फिर भी हटाने का दिल नही करता।कंघे के कई दाने टूट जाए फिर भी उसे अपने से दूर करना बुरा लगता है।झाड़ू टूट कर पतली और छोटी हो जाए फिर भी वह फेकी नही जाती।चप्पल में अंगूठे का पूरा एक सिरा घिस कर जवाब दे जाए फिर भी दिल कहता है इसे बाथरूम में तो रहने ही दें,फेंके ना।यह जो ज़िन्दगी के छोटे से लम्हों में घिसी हुई चीज़ें हैं यह बड़ी अपनी लगती हैं।घड़ी चलना बन्द कर दे फिर भी दीवार से ड्राज़ में आ जाती है।मोबाईल का कवर जितना भी घिस जाए डस्टबिन में फेंकने को दिल तैयार नही होता।चाय की प्याली का कुंडा टूट जाए तब भी फेंकने की जगह आँटा भर के अगरबत्ती लगाने के काम में ले आता हूँ।एक अजीब सी खब्त है इन चीज़ों से जुड़ी रहने की।मेरी ज़िन्दगी का बड़ा लगाओ टूथ ब्रश से रहा है।मैं दिल पर बड़ा से बड़ा पत्थर रख लूँ फिर भी यह फेका नही जाता।पुराने बैग नही हटाए जाते।अजीब हाल है, दुनिया ए फ़ानी की इन घिसी पिटी चीज़ में दिल रखना पता नही कहाँ ले जाएगा।कभी कभी लगता है रूह ही कबाड़ हो गई है।वैसे भी सड़े हुए गोश्त और सड़ाँध मारते दिमागों वाले जिस्मों से यह मामूली सी चीज़ें भली हैं।इनसे मोहब्बत है।यह वफ़ादार हैं, तब तक जब तक हम खुद इनके लिए गद्दार नही हो जाते।यह वह चीज़ें हैं जिन्होंने अपनी आखरी साँस तक अपनी सेवा दी।हम इन्हें शहीद मानते हैं।वैसे अपनी इस खब्त के लिए साइकोलॉजिस्ट से मिले।तो उन्होंने कहा हाँ यह होता है और इसका उन्होनो वह नाम बताया जो उनके सामने पन्द्रह बार लिया हो फिर भी याद नही हुआ।हाँ उन्होंने कहा जिनको ऐसी आदत होती है वह दूसरो की परवाह बिल्कुल नही करते।हम हैरत से उन्हें देख रहे थे कीजो शख्स इन यूजलेस चीज़ों से चिपका रहे,वह लोगों की न फ़िक्र करे।खैर यह साइकोलॉजिस्ट होते ही उलटे हैं या हो सकता है सही हों।मैं फ़िलहाल आज हो रिटायर अपने टूथब्रश के साथ रिटायरमेंट का गम मना रहा हूँ।©

No comments:

Post a Comment