उसकी शलवार से ख़ून टपक रहा था।रिस रिस कर ज़मीन पर एक ख़ून की धार सी करीब डेढ़ मीटर की बन गई थी।शलवार के पायंचे उतर कर पैर के पंजो में फंसे थे।शरीफ महल्ले का मामला था तो लोगो ने एक तहमद ऊपर के जिस्म में डालकर इज़्ज़त ढक ली थी।उसका सीना इतना फैल चुका था की लग ही नही रहा था औरत का है।पूरा तहमद जिस्म पर सपाट सा पड़ा था।चेहरा खुला था,आँखे भी पूरी खुली थीं।किसी ने उसे बन्द करने की ज़हमत नही की।खुली आँखों में रात के नंगेपन को साफ़ तरह देखा जा सकता था।मैं खड़ा देखता रहा।हल्का हल्का सुनने में आया की गई बारिश की रात कोई चार लड़के इसे यहीं छोड़ गए थे।उसका एक हाथ तहमद से बाहर था।गोरा था काफी।करीब जाने पर उन गोरे हाथों में नाखुनो के निशान दिखे ,जिनपर ख़ून जमकर काला पड़ गया था।जब गौर से बिना शिकन वाला माथा देखा तो अंदाज़ा हो गया की करीब चौदह या पन्द्रह साल की रही होगी,बेचारी।कुछ लोग अफसोस कर रहे थे तो कुछ बेहद गुस्सा।मैं सोच रहा था कौन कमबख्त लोग रहे होंगे जिन्होंने इसकी यह हालत कर दी।हालत क्या,मार ही डाला।बार बार उसकी हरी और पीले फूल वाली शलवार दिख रही थी।आँखे हटती फिर टिकती।सभी का यही हाल था।सुबह से काफी देर मैं यही देखता रहा।ख़ून खौल भी रहा और जम भी रहा।मन सोच सोच के परेशान की कौन लड़की थी।इसके परिवार पर क्या असर होगा।माँ तो इसकी टूट ही जाएगी।बाप तो ज़मीन में धँस ही जाएगा।अगर भाई हुए तो तड़प कर रह जाएँगे।तहमद से हल्का झलकता पेट देख लगता बेचारी पता नही किस खूबसूरत,नाज़ों से पली खानदान की है।तभी हवा में नाम तैरा।किसी ने बताया तबस्सुम।क्या तबस्सुम।ओहो।फ़ालतू वक़्त बर्बाद कर दिया। कोई मेरे मज़हब की तो थी नही।ज़िंदा होती तो बच्चे ही पैदा करती या कहें दुश्मन।पहले बता देते की मेरे मज़हब की नही है तो वक़्त न बर्बाद होता।चलो चाय पिया जाए।सुबह से फ़ालतू में कुछ खाया भी नहीं।आज ऑफिस में बड़ा काम है।चलो हटो।रास्ता दो।©
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