"मैं दिल साफ़ करता रहा और आप कागज़ काले करते रहे।" यह जवाब एक अनपढ़ का ज्ञानी को था।बात यों थी की हसन बसरी ज़बरदस्त इल्म वाले थे।उनके एक शिष्य थे हबीब अजमी।जो पढ़े लिखे न थे मगर प्रैक्टिकल में अपने उस्ताद से बहुत आगे थे।हुआ यूँ की दजला नदी के किनारे हसन बसरी खड़े कश्ती का इंतज़ार कर रहे थे,तभी हबीब अजमी ने उनसे कहा की ज़िन्दगी में जलन, हसद,दुनिया की मोहब्बत,नफ़रत,लालच दिल से निकाल दीजिये और पानी पर चलते हुए निकल जाइये।अजमी को पानी पर जाता हुआ देखते हुए हसन को शर्म आ गई और शाम को हबीब के दरवाज़े पर पहुँच गए।बोले तुम्हे यह मर्तबा कैसे मिला हबीब।हबीब मुस्कुराकर बोले आप ताउम्र लिखते रहे और हम उसे ज़िन्दगी में उतारते रहे,बस हो गया।यह भी क़िस्सा है किसी ने कहा की हबीब आप तो अनपढ़ हैं तब इतने ऊँचे सूफ़ी कैसे हो गए तो उनका जवाब था मेरी ज़बान अनपढ़ है मगर दिल नहीं।वह सब समझता है।
हाँ तो हसन बसरी जब हबीब के घर आए तो तो हबीब के यहाँ खाने को कुछ नही था।एक सूखी रोटी और नमक की कुछ कंकरिया खाने को दी।हसन ने अभी खाना शुरू ही किया था की एक फकीर ने आवाज़ दी।हबीब ने हसन के सामने से रोटी उठाकर फकीर को देदी।तब हसन बोले ऐ हबीब तुम यक़ीनन बहुत नेक दिल हो फिर भी अगर ज़रा इल्म भी तुममे होता तो अच्छा होता।तभी किसी के यहाँ से थाल भर पकवान हबीब के घर आए।हबीब ने उन्हें हसन के सामने रखा।हसन ख़ुशी ख़ुशी खाने लगे।तब हबीब बोले ऐ मेरे उस्ताद आप नेक इल्म वाले हैं अगर आपको अपने ख़ुदा पर अटल विश्वास होता तो बहुत अच्छा होता।यह तो रहे किस्से मगर इसकी पहली लाइन ही सबसे प्रैक्टिकल है मेरे लिए।हम जीभर लिखें।कागज़ों को भर भर ढेर लगा दें,अगर यह ज़िन्दगी में न उतरे तो यह कागज़ों को गन्दा करने के सिवा कुछ भी नहीं।सूफ़िज़्म वह थ्योरी है जो प्रैक्टिकल पर टिकी है।जो लिखा कम और ज़िन्दगी में उतारा ज़्यादा गया है।ऊन का लबादा ओढ़े सूफ़ियों ने सोने और हीरे के दिलों को बदल कर मिट्टी कर दिया।उस मिटटी के दिल ने हज़ारों नए बीजों में अँकुर फोड़ डाला।यह बद तब मुमकिन हुआ जब लफ्ज़ लफ्ज़ ने रूह में जगह पाई।जब इंसानो का फ़र्क मिट कर रूह ने रूह को क़ुबूल कर लिया।हसन बसरी जैसे उस्ताद और हबीब अजमी जैसे शागिर्द के रिश्ते अब मुश्किल से भले मिले मगर यह आज भी होंगे ही।तभी तो नम नम हवा का खूबसूरत झोका रूह को तरोताज़ा कर जाता है।सूफ़िज़्म को पढ़िए कम प्रैक्टिकल ज़्यादा कीजिये तब तो इसके एहसास को जी पाइएगा वरना कोर्स की किताबो की तरह यह भी बुक शेल्फ की ज़ीनत बन कर ही रह जाएँगे।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, July 2, 2016
सूफ़ी किस्सा
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