Friday, July 1, 2016

चौखट

हम अक्सर शहर में सालों से रह रहे एक इंसान को देखते हैं जो सालों पहले गाँव छोड़ शहर का हिस्सा हो चुका है, गाहे बगाहे दिल गाँव की खुशबू में डूबता उतराता रहता है...
हेकड़ी थी या थी मजबूरी
जो गाँव छोड़ना था ज़रूरी।
छोड़ी थी वह चौड़ी चौखट
पाने को बालिश्त भर ज़मीन
खुले आसमान को ठुकराकर,
भुरकों में अब ढूंढते हैं नींद।
इसी ठसक में इसी कसक में
पक्की सड़कों पर क्यों हो आए
लम्पट शहरी होते हुए भी तुम
पूरा गाँव साथ शहर में लाए।
भागे भागे ख़रबूज़े पर अटके।
औंधे पौधे तरबूज़ पर लटके।
बांध सत्तू और बाटी चोखा।
शहर को दिया गंवई धोखा।
साग,सब्ज़ी,चूड़ा, पूरी,तिल।
फूट ककड़ी में रखा है दिल।
जो छोड़ी थी चौखट वह,
अब भी तुममें है बेपरवाह
तुम्हारी नई देहरी में टँगा
आम का पत्ता है गवाह।
तुम गए नही हो,हो तुम आए।
पूरा गाँव साथ शहर में लाए।
©

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