इमामबाड़े के सामने वाला गुलाब पार्क था,जहाँ तुम मिलने आई थीं।मैंने हाथ पकड़ तुम्हे हरी घाँस पर बिठाया था की तुम चिल्लाई,की कीचड़ में बिठा दिया।तुम्हे नही याद होगा की उस दिन आधे घण्टे हम तुम गुलाब पार्क बनाम सीसीडी पर लड़ते रहे।जब मैंने कहा की सीसीडी में कितनी देर बैठ पाते,बड़ी मुश्किल से सबसे सस्ती वाली 144 रूपये की दो कप कॉफी पीते और आधा घण्टा ही गुज़ार पाते।यहाँ पार्क में मौज से चाहे जै घण्टे बैठो।तब तुमने पास में लगे गुलाब का कांटा मेरे घुसाते हुए कहा था,कँजूस।मगर तुम मुस्कुरा दी थीं।फिर हमारी दोस्ती की पींगे आगे बढ़ती की तुम सवालो का टोकरा लेकर बैठ गईं।वह भी इस्लाम पर।हमे लगा की हमारे सामने लड़की नही कोई फ़रिश्ताइन बैठी है।हम गुलाब पार्क में नही बल्कि कब्र में हैं, इतने सवाल।इस्लाम पर मेरी समझ को जितना तुमने खंगाला होगा इतना तो पनामा पेपर्स वालों ने भी नही खंगाला होगा।तुमने पूरे छः कलमे मुझसे सुने जिनमे से दो मैं सुना पाया,जो कभी अम्मी ने भी नही सुने होंगे।इस्लाम के पाँच फ़र्ज़ भी पूछे जो अब्बा ने कभी नही पूछे।मैं नही बता पाया तो मेरी शर्मिंदा नज़रें,बारिश से भीगी घाँस में फंसे कीड़े को देखने लगी थी।जब मैंने कहा मैं इत्र नही डियोड्रेंट लगाता हूँ तो तुमने पँचर टायर सी शक्ल बनाकर मुझे घूरा था।तुमने भुट्टा खाते हुए हमसे पूछा था की अच्छा कुरान को तो मानते होंगे।तब मैं पूरी ईमानदारी से बोला था की उतना ही मानता हूँ जितने के माइने समझ आते हैं।तुमने अपना आधा खाया भुट्टा मेरी सफ़ेद शर्ट पर मारते हुए सड़क पर फेका और कहा था जाओ घुसो,काफ़िर।मैं नही मिलती अनाप शनाप लोगों से।मैं हैरत से एक पाक पाबन्द लड़की को इतनी वाहियात ज़बान के साथ बर्दाश्त कर रहा था।मगर जैसे ही मैं झुका और मेरा पर्स जेब से फिसल कर गिरा की तुम फिसल गई।दो दो एटीएम कार्ड जब तुम्हारे पैरों पर बिखरे तो तुमने झट से उठाया और कहा चलो खैर रहने दो,तुम्हारा ईमान तुम जानो,हमे क्या।हम तो तुम्हारे साथ खुश हैं।मैं पछुआ ठण्डी हवाओ में अंदर से सुर्ख़ हो रहा था।तभी मैंने तुम्हे नकार दिया की जाओ और कोई इत्र वाला ढूंढ लो।काहे से की तुम्हे प्यार तो करना नही है,तुम्हे तो जन्नत का बन्दोबस्त करना है।दफ़ा हो जाओ।मुझे तो सख्त नफ़रत आ रही है।जाते जाते सुन लो वह एटीएम भी मेरे नही थे।मैं गुलाब हूँ मनीप्लान्ट नहीं।दफ़ा हो जाओ नही तो कांटा चुभो दूँगा।तुम्हे तो मैं चुटकी भर भी याद नही करता।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, July 28, 2016
आशिकी अष्ठम
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