मैं आज सिर्फ और सिर्फ मुसलमानो की बात करना चाहता हूँ।हर मौके पर इन्हें मुँह के बल गिरता, रुस्वा होते हुए देखता हूँ।मामूली से मामूली गैर ज़रूरी कमज़र्फ भी इन्हें सलाह देते हैं।जिनसे अपनी किताबें नही सम्भालती वह इनकी किताबों पर टिप्पड़ी करते हैं।मैं मुसलमानों से पूछना चाहता हूँ की तुम इतने हैरान,परेशान से क्यों हो।क्यों हर एक को शक से देख रहो हो।क्यों नही भरोसे से आगे बढ़ पा रहे हो।मैं वाक़ई परेशान हूँ तुम्हारी हालत पर,तुम्हारी बेचैनी पर।तुम्हे बिलकुल तन्हा देखकर मैं रुक जाना चाहता हूँ।मैं मानता हूँ ज़ुल्म होता है मगर उसके विरोध में बन्दूक थामने को कैसे तैयार हो जाते हो।तुम्हारी औरतो के कपड़े फाड़े जाते हैं नौजवानों को मौके नही मिलते,किराये के मकान नही मिलते,तुम एक बेकार भीड़ हो,फिर भी तुम बन्दूक क्यों उठाते हो।
मैं तुम्हारी गलियों में घूमता हूँ तो साफ़ फ़र्क़ देख पाता हूँ।मक्खियाँ भिनभिनाती नालियाँ और गन्दी गन्दी तंग गालियो में तुम्हारी सीलन को देखता हूँ तब सोचता हूँ की यह तस्वीर कैसे बदले।मगर हमारी तुम्हारी हिँसा की फिलासफी रत्ती भर नही समझ आती।तुम अपनी हिंसक सोच को नकार तो नही सकते।बहुत बार तुम हिंसक नही होते हो मगर गुस्सा बहुत होता है।हम सिर्फ बन्दूक उठाने की नही बल्कि उस गुस्से को दिखाना चाह रहे जो गलत दिशा में निकल रहा है।मुझे तुममे त्याग और लगातार अहिंसक तरीके से लड़ने की बहुत कमी लगती है।अगर तुम्हे लगता है की तुम्हारे साथ गलत हो रहा तो उठो और आमरण अनशन शुरू करो।भूखे रहो।प्यासे रहो मगर बन्दूक मत उठाओ।मैं हैरत में हूँ जिस भीड़ को इतना सताया गया हो जैसा की वह मानती है तो वह लड़ने की जगह जूझने का प्रयास क्यों नही करती।तुम इण्डिया गेट पर अपने हक़ के लिए दो दिन भूखे क्यों नही रह सकते।कश्मीर को देखता हूँ तो सोचता हूँ यह बन्दूक तो बड़ी आसानी से उठा लेते हैं मगर अहिँसा से लड़ना इन्हें रत्ती भर नही आता।तुम हथियार से मोहब्बत क्यों नही छोड़ते हो।हर चीज़ का हल अगर तलवार होती तो तुम या कोई भी दुनिया पर राज कर लेता।ऊपर से नीचे तक मैं उस लीडरशिप की शून्यता देख रहा हूँ जो तुम सबको मेन लाइन पर ला पाए।हर एक तुम्हे इस्तेमाल करके मुस्कुराता हुआ निकल जा रहा है।यह जो कट्टर नेता हैं यह तो और गैर ज़रूरी हैं।मैं चाहता हूँ तुममे कोई गाँधी पैदा हो।जिन्ना तो लाखों की तादात में है मगर एक अदद गाँधी तुमसे नही पैदा होता।मैं चाहता हूँ तुम्हारे पिछड़ेपन के लिये जूझना मगर इसके लिए दिल और दिमाग से हिँसा को निकालना होगा।मेरी बात को गौर से सुनों अगर वाक़ई कुछ बुनियादी सुधार चाहते हो तो बच्चों को किताब और कलम थमाओ और तुम खुद काम करो और बचे हुए घन्टो में अहिँसा के साथ एक जगह अनशन करो।आमरण अनशन करो।जब तुम्हारे नेता बिरयानी और शेरवानी छोड़कर आसानी से तुम्हारे साथ इण्डिया गेट पर भूख हड़ताल पर बैठेंगे तब तुम देखना एक जनसमर्थन उन्हें भी मिलेगा।यह मेरा देश है जो हर सही को प्रयाप्त भीड़ देगा।अपने नेताओं से पूछो की इत्र की खुशबू उन्हें प्यारी है या तुम्हारे पसीने की गंध।सफेद चमकते रुमाल प्यारे हैं या तुम्हारा घिसा पिटा अंगौछा।जब इन सवालो का जवाब मिल जाए तो उनका दामन पकड़ो और कह दो की हम और तुम तब तक नही उठेंगे जब तक अपने बच्चों के लिए एक अदद मुस्कान न मिल जाए।बोलियों,व्यंग्य, आलोचना,नकारे जाने की अफवाह,दुर्भावना से हरगिज़ मत घबराओ।मैं तब तक तुम्हारी यह स्थिति को बना हुआ रहता देख पा रहा हूँ जब तक तुम खुद दो कदम बाहर नही निकालते।आज सिर्फ तुमसे बात कर रहा हूँ क्योकि तुम्हारी रुसवाई और तुम्हारी काहिली हमे मजबूर कर रही है।अब अपने इतिहास पर गुरूर छोड़ दो।आज देखो और कल के लिए मेहनत करो।ज़बानी नही दिल से यह मान लो की यह ज़मीन तुम्हारी है, यहीं के लोग तुम्हारे अपने हैं,वह चाहे जितना नकारें।यह समझ लो अमीर भाई गरीब भाई से रिश्ता रखने में बेइज़्ज़त महसूस कर रहा।इसलिए उस अमीर भाई को अपनी लगन और मेहनत से सामने बैठकर दिखाओ।बहुत से लोग तुम्हे सहारा देना चाहते हैं।उनको देखो,पहचानो,उनकी इज़्ज़त करो।उनपर भरोसा करके ज़िन्दगी के मशविरे करो और जूझकर आगे बढ़ोहो सकता है तुम और दूसरे लोग मुझे गलत समझे मगर मेरी नज़र में कोई और हल नही दिखता।तुम अपने दिल को बड़ा करो।उसमे मोहब्बत भरो।त्याग से उसे सींचो और अहिँसा के साथ अपना हक़ लो।आमरण अनशन पर अपने पिछड़ेपन का हिसाब लो।वहीं धूप में भूखे प्यासे बैठकर अपनी और मुल्क़ की तरक्की के वादे लो।यक़ीन मानो यह उपजाऊ ज़मीन वह सब तुम्हे देगी जिसकी तुम्हे ज़रूरत है।तुम तलवार और बन्दूक से जितनी जल्दी पीछा छुड़ा लोगे उतनी जल्दी आगे बढ़ जाओगे।कलम और किताब तुम्हे आगे का रास्ता दिखाएंगी।हर मज़हब की अच्छी किताबो को पढ़ो ताकि तुम्हे लगे की ख़ुदा ने वाक़ई ज़मीन के किसी भी हिस्से को अच्छे लोगों से महरूम नही रखा।
कुछ लोग यहाँ भी तुम्हे बुरा कहेंगे,घबराना मत।वह मक्खी हैं जो ढूंढ कर गन्दगी करेगी।तुम मधु मक्खी बनो ताकि दुनिया को मिठास दे सको।बस एक बार खुद सोचो की तुममे कोई गाँधी क्यों नही आया।क्या कोई गाँधी को तुम जगह दे पाओगे।क्या तुम वाक़ई अपने सुधार के लिए गम्भीर हो या यह सिर्फ तमाशा भर है।जब जवाब सूझे तो गाँधी को ढूंढो न मिले तो खुद बन जाओ गाँधी। ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, July 13, 2016
ढूंढो गाँधी को
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