Friday, July 15, 2016

नफ़रत

मालूम है तुम सब बेहद ताक़तवर हो गए हो।ईंट का जवाब पत्थर से देने लगे हो।ख़ून का जवाब ख़ून से देने लगे हो,बढ़िया है।मुझे कोई शिकवा नही क्योंकि यह ज़मीन का भाग्य है की उसे ख़ून पीना ही है।जो ज़मीन जितनी गन्दी,घिनौनी हो जाएगी उसे अपने सफाई के लिए ख़ून की ही ज़रूरत पड़ेगी।तुम्हे लगता है तुम्हारी नसों में ख़ून बह रहा,भक्क्।तुम्हारी नसों में डिटर्जेंट पाउडर बह रहा है जो किसी भी वक़्त ज़मीन की सफाई के लिए निकाला जा सकता है।बस इतना भर है की यह ज़मीन अगर एक वर्ग को नापाक लगेगी तो दूसरे को पाक़।तो मान लो नापाक वाला कभी न कभी इसे पाक करने के लिए खून बहाएगा ज़रूर।तुम तमाम दलीलें दो ज़मीन से मोहब्बत की,सब झूठी और फ़रेब से गढ़ी हुई हैं।तुम्हारे मन में एक कोने में बैठी शासन और सत्ता की खूंटी ही इस दलील को झूठा साबित करती है।दिमाग से यह भी निकाल लो की कोई किसी को खत्म कर पर पाएगा।जब अमरीका जापान में खून का समन्दर बहाने के बावजूद उसके विकास को नही रोक पाया तो समझ लो यह मामूली।गोलिया कितना रोक पाएँगी।असल में जो आपके अंदर एक राक्षस बैठा है उसके पास खून बहाने की हमेशा दलील रहेगी।जब सब चले जाएँगे तो आप अपनों का खून बहाएंगे।उस राक्षस को खून से खेलना बहुत पसन्द है।आपकी गलती भी नही है, जिसे अपने जिस्म,दिमाग पर नियंत्रण ही न हो उसे तो ऐसा होना ही चाहिए।आप रोज़ तर्कों की किताब का बण्डल लिए खड़े रहेंगे की क्यों ज़रूरी है खून बहाना, बदला लेना,मुँह तोड़ जवाब देना वगैरह वगैरह।दीजियेवैसे भी कोई रोक तो सकता नही है।इतिहास से वह उदाहरण खोज कर लाइयेगा जिससे लगेगा की अभी अगर खून नही बहाया अधर्मियों का तो ज़मीन हमसे हिसाब लेगी।बदला लेने के लिए हम कृष्ण,उमर, सलाहुद्दीन अय्यूबी,राम के उदाहरण तपाक से लपक लेते हैं न मगर असली ज़िन्दगी में इन्हें छूते भर भी नहीं।मैं दावे से कहता हूँ की यह जो तलवार,त्रिशूल,बम,बन्दूक लिए हैं इन्होंने अपने जीवन का एक घण्टा भी अपने पूजनीय की तरह नही गुज़ारा होगा।यह बड़े झूठे लोग हैं।इसलिए इनसे सकारात्मक उम्मीद तो मेरी भी खोखली ही होगी।यह अभी हिँसा के तर्को से हमे शय्या पर लेटा हुआ भीष्म बना देंगे।खैर आपके विचार आपके हैं।आपके खून से रंगे हाथ आपके हैं जैसे चाहें जियें या मारें।वैसे भी यह ज़मीन है न यह इतनी अद्भुत है की उलट, पलट करके अपने लिए कोई खूबसूरत निर्माण कर ही लेगी।कल न हम होंगे न आप होंगे न आतँकी होंगे न रक्षक होंगे।कल तो कल होगा कोई खूबसूरत बच्चा अपने लिए बढ़िया पेड़ लगा रहा होगा जिसकी जड़े हमारे आपके बहाए खून को ढूंढ कर उसे पियेंगी ताकि इस नफ़रत का अंत न होने पाए।नफ़रत की उम्र बड़ी लम्बी होती है।आपकी दिनभर की बातों से एक शब्द में नफ़रत जीत लेती है।आप अपने मुर्दा जिस्म और रूह में नफ़रत को ज़िंदा रखिये क्योकि ज़िंदा जिस्म और रूह में इसका दम घुटता है।यह नफ़रत मर जाती है मेरे दोस्त।©

No comments:

Post a Comment