कान, आँख,दिमाग सब खोलकर सुन लीजिये जब ज़ुल्म की इन्तहा हो जाएगी तो आपके घर के बच्चे भी उसकी लौ में लपटेंगे।यह जो टिड्डियों की तरह भीड़ बन कर एक सुर में अच्छे भले लोगों को विलेन बनाने का गन्दा खेल खेलते हैं इसकी भी सज़ा नासूर की शक्ल में मिलेगी।मैं हैरत में हूँ की यह पढ़े लिखों के दिमाग हैं या नगर निगम के कूड़ा घर,इस क़दर नफ़रत।कानून,संविधान सब तो तमाशा हो चला है।अब जँगल में सारे फैसले भीड़ और गोलियाँ करेंगी।कश्मीर से कन्याकुमारी तक अराजकता इतनी बढ़ चुकी है की मुँह से निकले हर लफ्ज़ पर लाठी लिए सांस्कृतिक गुंडे खड़े हैं।पुलिस की वर्दी उतार लीजिये और खूंटियों पर टांग दीजिये।जज साहब से भी कह दें की अब घर पर आराम करें यहाँ उन तक पहुँचने की कोई ज़हमत नही उठाता।मैं घोर चिंता में हूँ की यह मेरा मुल्क़ है।जिसमे लोगो को एक डब्बे में बैठा एंकर भेड़ की तरह हाँक रहा हैं।पहाड़ जैसे जिस्म वाले सोफे पर बैठे रिमोट से टीवी चला रहे और न्यूज़ रूम में बैठा एंकर इन बड़े जिस्म और हल्के दिमाग के लोगो को चला रहा है।इस पूरी भीड़ की नज़र और दिमाग पर काई लग चुकी है।अब एक सुर में फटी आवाज़ में बेसुरा राग छेड़ मेरे भारत को उलझाए हैं।हम उन आँखों को आँख ही नही मानते जो सिर्फ वह देखे जो दूसरा दिखाए।उस दिमाग को तो हरगिज़ दिमाग नही कहूँगा जो दूसरो के कहे को अंतिम सत्य मान ले।।मैं अभी कह रहा हूँ जिनकी कौम खतरे में हैं या जिनकी देशभक्ति खतरे में या जिनकी संस्कृति खतरे में है वह सब झूठे हैं।असल में इन सबसे देश खतरे में हैं।मुल्क़ की बेचैनी महसूस कर सको तो महसूस करो।वैसे भी जिनके दिल साफ़ होंगे,किरदार अच्छे होंगे,मोहब्बत होगी वही ज़मीन और ज़मीर की आवाज़ सुन सकेंगे बाकि सब दूसरे की बजाई धुन में सिर्फ नफ़रत ही कर सकते हैं।जिनको यह पढ़कर फूट फूट कर सवाल आ रहे हों वह अपने गिरहबान में झाँके की जीवन में कभी कुछ जोड़ने का काम किया है।कभी किसी की काम आए हैं।कभी मोहब्बत से दूसरो को देखा है या सिर्फ ज़हर से दिमाग लकवा मार चुका है।मुल्क़ सिर्फ मोहब्बत,त्याग और समर्पण से मज़बूत होता है बाकि सारे रास्ते आपके सामने हैं और बिखरती इंसानियत तो हम रोज़ देख ही रहे हैं।©
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