हाँ तो कभी बाँसुरी सुनी है।वह टीवी वाली नहीं।वह जो होंटो से लगी सौंधी खुशबू में लिपटी हो।मेरे कान्हा की बाँसुरी।कैसे सुन सकते हैं जब दिल में इतनी गर्मी हो तो कान्हा का यह रूप कहाँ आपको दिखेगा।बाँसुरी की एक खासियत होती है,जैसे ही आपको उसकी पहली आवाज़ आती है तो सारे जीव जन्तु सुनने लगते हैं मगर अगले ही मिनट उससे मोह छूट जाता है।अब यहाँ से शुरू होता है सफ़र बाँसुरी का।जब आप दोबारा दिल लगाते हैं तब आप डूबने लगते हैं।फिर इतना डूब जाते हैंकी कोई और आवाज़ कान में आना बन्द हो जाती है।फिर धीरे धीरे आप ज़मीन से कटने लगते हैं।वह बाँसुरी आपको ऊपर उठाती है।पूरे जिस्म में लहरें पैदा करती है।मैं जब कान्हा की बाँसुरी देखता हूँ तो सोचता हूँ आखिर कृष्ण ने बाँसुरी कोही क्यों थामा।सोचते सोचते लगा की बाँसुरी की यही धुन हमे इंसान बना दे रही है।मैं तमाम मन्दिरो में झाँका तो देखा कृष्ण को बाँसुरी के साथ प्रेम के प्रतीक के लिए पूजा जा रहा।मेरे कृष्ण के मुँह से निकली हर धुन ने लोगों के दिल को झकझोर दिया।वैसे मैं यह नही समझ पाया जो कृष्ण के महाभारत के चरित्र से सीख कर आगे बढ़े,वह कहाँ गए,उन्हें कोई नही जानता।कृष्ण के रथ पर सवार,चक्र लिए चरित्र से मोहित लोगों का न मन्दिर ही जल्दी दिखा न उन भक्तो का कोई वजूद मिला।मगर।मगर मेरे कान्हा के गाय से टेक लगाए,मोर का पंख धरे,मासूम सी मुस्कान के साथ बाँसुरी का जो रूप था,वह हर जगह मिला।इस रूप के भक्त या प्रेमी भी उतना ही नाम कमा पाए जैसे मीरा,रसख़ान।मैं बाँसुरी के हर छिद्र से निकले मधुर संगीत को महसूस कर सकता हूँ।मुझे मेरे कान्हा की बाँसुरी से उठता संगीत बुद्ध, हज़रत मोहम्मद,ईसा,दाऊद से होता हुआ मूसा से जोड़ देता है।वैसे एक बात बताएँ आप तब तक मेरे कान्हा का संगीत नही सुन पाएँगे जब तक आपके दिल में गर्मी होगी।भला ऐसा भी हुआ है की जहाँ नफ़रत हो वहाँ मेरे कान्हा हों।जिस दिल में नफ़रत,बदला,गुरूर,ख़ून खराबा, झगड़ा हो भला वहाँ कान्हा की बाँसुरी की आवाज़ पहुँचेगी।कभी हो सके तो जल्दी से बिना कोई परवाह किये,बेलौस मोहब्बत से कान्हा को देखना,गौर से उनकी बाँसुरी को देखना और फिर अपने दिल में झाँकना,अगर उसमे नफ़रत नही होगी तो बाँसुरी से फूटते लफ्ज़ तुम्हारे दिल में होते हुए दिमाग को इतना खोल देंगे की तुम्हे यही ज़मीन मोहब्बत से भरी नज़र आने लगेगी।तुमसे पेड़ पौधे हँस कर बात करेंगे।तुमसे इंसान मिलने को तड़पेगा,जानते हो क्यों क्योकि तुम मेरे कान्हा की सच्ची आवाज़ सुनकर लौटे हो।ज़रा से मेरा कहा मानलो एक बार मेरे कान्हा को महसूस तो करो तब देखो तुम्हारी सारी बेचैनी खत्म हो जाएगी।जो दिनभर हैरान परेशान चेहरा लाल लिए भागे भागे फिरते हो,तुम्हे कान्हा की बाँसुरी से सुकून मिलेगा।मेरे दोस्त वह सुकून जो तुम माँ की गोद में सदियों पहले छोड़ आए हो।उसे महसूस करो दोस्त।
।। मुझे अपनी निगाहों के पास रहने दे।।
।। तू कृष्ण है तो मुझे सूरदास रहने दें ।।
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कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, July 17, 2016
बाँसुरी
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