Sunday, July 24, 2016

आतँक के खिलाफ

एक धमाका और बहुत सी साँसे थम गई।जमींन का कोई हिस्सा नही बचा जहाँ तुमने ख़ून नही बहाया।मैं वाक़ई नही समझ पा रहा हूँ की तुम क्या चाहते हो।दुनिया से आबादी खत्म करने का टेंडर तुम्हे तुम्हारे ख़ुदा ने दिया है या यह तुम्हारी खुद की उपज है।मैं लोगों के जिस्म के टुकड़े देखता हूँ फिर तुम्हे देखना  चाहता हूँ।देख कर यह कोशिश करना चाहता हूँ की शैतान की शक्ल कैसी होती है।यक़ीनन तुमको शैतान कहना, शैतान को भी बेइज़्ज़त करना है।लोग आतँक के धर्म को ढूंढ रहे हैं जो तुम्हारे नामों से सौ फीसद ज़ाहिर होता है।मैं यह नही कहूँगा की इस्लाम का आतँक से कोई लेना देना नही।या यह भी नही कहूँगा की आतँक का किसी धर्म से कोई लेना देना नही।बिलकुल तुम अपने एक मज़हब के साथ वजूद रखते हो।मैं आतँक में फ़र्क नही करता।अब मैं बात करता हूँ की तुम्हे रोका कैसे जाए।पहला आसान तरीका है की तुम्हे पलक झपकते ही मौत के घाट उतार दिया जाए।मगर यह टिकाऊ नही है।ज़रूरत है जिस्म को मारने की जगह तुम्हारी सोच को मारा जाए।जिस दिन सोच मर जाएगी उस दिन आतँक का उत्पादन खुद बखुद खत्म हो जाएगा।अब यह उत्पादन रोका कैसे जाए।यह सवाल इतना आसान नही है।यह मेहनत का लम्बा रास्ता है।जिसपर धैर्य के बिना नही चला जा सकता।मैं आतँक को समूल नष्ट करने का विचार और युक्ति रखता हूँ मगर यह वाक़ई वक़्त लेगा।इस वक़्त में लाखों और जिंदगियां खत्म हो जाएँगी।।बहुत बार जज़्बात से हम लम्बे रास्ते बन्द कर देते हैं।मैं भी ख़ून देखता हूँ।तड़पता हूँ।चेहरा सुर्ख़ लाल हो जाता है।जी चाहता है की अब नही मगर फिर कहता है दिल,ठहर कर सोचो।शैतान को शैतान बन कर कभी खत्म नही किया जा सकता।शैतान को खत्म करने के लिए भगवान बनना पड़ता है।अब आप कहेंगे यह असम्भव है।मैं कहूँगा हरगिज़ नही।जब शैतान बनना सम्भव है तो भगवान बनना भी सम्भव है।ख़ून,जिस्म के लोथड़े,तड़पती ज़िन्दगी को देख कर विचलित होइए मगर ध्यान से।अपने गुस्से को पालिए ताकि निशाना सही दिशा में लगे।त्वरित जवाब पागलपन की निशानी है।इससे आतंकियो को ख़ुशी मिलती है।मैं विस्तृत से इसे खत्म करने की सोच रखता हूँ मगर आपको परेशान देख मैं भी परेशान हो जाता हूँ।आपकी भीगी आँखे हमे कमज़ोर करती हैं।मैं अपने घर की लाशों पर नही टूटा मगर आपके दिल की नमी हमे तोड़ देती है।मेरे घर में जिस्म के टुकड़े सफेद कपड़े में भरकर आए मगर मैंने दिशा नही बदली मगर आपका यूँ तड़पना मुझे धुन्धला करता है।मैं हर आतँकी हमले के बाद बेहद कमज़ोर हो जाता हूँ।खाना छुट जाता है।घर में अकेला बन्द खुद से सवाल करता हूँ की यह कैसी रुकेगा।कब रुकेगा यह तो पता है।यह तब रुकेगा जब हमारा इलाज का सिद्धान्त कारगर होगा।क्रिया की प्रतिक्रिया कभी शांत न होने वाली क्रिया है।इसको रोकने का काम करना होगा।आज मैं आतँक के विरुद्ध और कारगर रास्ते की तलाश में हूँ तब तक आप इसे जैसे चाहे नष्ट करने में लगे रहें।हो सकता है मैं थोड़ा गलत हूँ या पूरा गलत हूँ,मुझे नही पता।बस मैं किसी भी हाल में इस आतँक खत्म करने के लिए लगा हूँ।वक़्त लगेगा मगर हर निर्माण का वक़्त लम्बा और कष्टकारी है।मुझे धैर्य से सधे हुए,ईमानदार साथ की ज़रूरत है।वह सब एक हों,रास्ता यक़ीनन निकलेगा।©

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