Tuesday, July 19, 2016

हाशिम अंसारी

उन्हें ऊँचा सुनाई देता था।काफी ऊँचा।चिल्लाकर बोलना पड़ता था अगर वह अपनी सुनने की मशीन न लगा लें।हम मिले कई बार मगर उनके घर पर दो बार ही जाना हुआ।छोटा सा दरवाज़ा सफ़ेद चुने से पुती दीवार में ऐसे फिट था जैसे गरीबी उनके माथे पर।छोटे से घर के बाहर टेंट में घर के लोगो से ज़्यादा सेक्योरिटी गार्ड।हमारी और हाशिम चाचा की पहली बातचीत इन्ही गार्ड के बीच हुए मगर फिर यह हमारे बीच से हट गए।हाशिम अंसारी को पूरा देश लगभग जानता तो था क्योकि देश के सबसे बड़े झगड़े की जड़ के वह चश्मदीद गवाह थे।वही बाबरी मस्जिद के गिरने के गवाह जिसने देश को दो हिस्सों में बाँट दिया था।वही सफ़ेद इमारत जिसने सबका ख़ून सफेद कर दिया था।मैं बात कर रहा हूँ उन्हीं हाशिम अंसारी की।आज पुरे 96 साल बाद आखिर वह भी दुनिया ए फानी से रुखसत हो गए।उस दौर के अच्छे बुरे सभी के जाने का सिलसिला लगा हुआ है मगर उन सबमे सबसे अलग थे हाशिम अंसारी।न किसी से झगड़ा बस एक मकसद की अपना मुकदमा लड़ना है।लोगों ने तरह तरह की लालच दी वह नही बहके।एक उस मुकदमे से हज़ारों की तादात में लोगोकी ज़िन्दगी चमक उठी मगर हाशिम अंसारी के घर की दीवारें आज भी काली हैं।सब अमीर हो गए जबकि हाशिम किसी तरह किराये का जुगाड़ करके लखनऊ मुकदमो में आया किये।
मैं जब मिला तब वह बूढ़े थे मगर बात में दम रखते थे।काफी बाते हुईं जो लिखी नही जा सकती हैं।न हाशिम चाहते थे वह बाहर आए न हम चाहते हैं।जो वक़्त गुज़र गया उसपर मिटटी ही अच्छी है।हाशिम के अयोध्या के ज़्यादतर सभी लोगो से अच्छे सम्बन्ध थे।मैं मणि पर्वत के महंत से भी मिला उसी दिन।उन्होंने भी हाशिम की तारीफ़ की।हनुमानगढ़ी के महंत ने भी तारीफ़ की,ज़्यादतर ने कहा हाशिम चाचा दिल के बेहद अच्छे हैं और हमारी अयोध्या की शान हैं।जो न बिका न डिगा न रुका बसजूझता रहा।आज जब वह नही हैं तब लगेगा की कौन चला गया।आज जब हाशिम सफेद दीवारों से मटमैली दीवारों में ज़मीन के अंदर सो रहे होंगे तो अयोध्या की ज़मीन कहेगी मैंने अपने हिम्मती बेटे को देखो,आखिर बाँहों में लेलिए।हर लड़ाई बोर्डर पर नही लड़ी जाती।कुछ लड़ाई खुद के भीतर होती है।कुछ लड़ाई देश के भीतर होती है।इन दोनों में हाशिम अंसारी ने जीत हासिल की है।मुझे ख़ुशी है की जिस अयोध्या काण्ड के कारण पूरे देश मे भाई चारे को चोट पहुंचाई उसे अयोध्या के लोगो ने तो नकार ही दिया।हाशिम आज जहाँ भी होंगे अपने मिलनसार मिजाज़ और अटूट जूझने की ताक़त के साथ दिलों में ज़िंदा होंगे।मुझे नही मतलब की वह क्या कर रहे थे।कैसे कर रहे थे।बस मुझे यह याद है की वह हर एक के दिल में अच्छी जगह बनाए हुए थे,जो हमेशा ज़रूरी है।हाशिम ऊपर जाना तो जाकर ऊपर पहुँच चुके लोगों को बताना की नीचे उनके बोए बीज बबूल के जँगल बन चुके हैं।वह जो चाह रहे होंगे,वह तो नही हुआ,बल्कि दिल बुरी तरह बट चुके हैं।बटे हुए दिलों से इमारते नही बनती।हाशिम अंसारी उन सबको मेरा अभिवादन देना और अब सुकून से ऊपर से नीचे उन लोगों को देखना जो शायद कुछ कर सकें।हौसला देना ईमानदारी से जूझने का।अब जब अयोध्या जाएँगे तो आपका न होना मायूस करेगा। ©

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