Sunday, July 10, 2016

लाल प्रेमगीत

हाँ तो मैं अब प्रेम गीत लिखूँ।वह गीत जिसमे बच्चों की भूख मत हो।वह पंक्तियाँ जो गरीब के ज़िक्र से गरीब न हों।मैं चाहता हूँ झर झर झड़ती बारिश पर लिखूँ।मदमस्त भौरों पर लिखूँ।मन्द मन्द हवाओं को लिखूँ।मेरे लिखने में चीखें एक बाधा है।जब मैं भौरों की आवाज़ सुनता हूँ तो मुझे भीख माँगते बच्चों की भिनभिनाहट सुनाई देती है।कैसे लिखें प्यारे भौरों पर।मेरी कलम बारिश की हर बून्द को समेट लेना चाहती है मगर उस औरत के आँसू मेरी कलम को खट्टी कर देते हैं।मैं फूलों को छूकर अपनी सियाही से उभारना चाहता हूँ मगर ज़मीन से उठती भीनी भीनी नफ़रत की गर्मी मेरे फूलों को कुम्हला देती है।तुम्ही बताओ मैं कैसे प्रेम गीत लिखूँ।वक़्त घटता जा रहा है, कलम सूखती जा रही है, कोई यह जल्दी से तक़लीफ़ की बदसूरत तस्वीर को हटाए ताकि मैं झट से उठकर प्रेमगीत लिखूँ।जिसमे श्रृंगार रस का अनन्त रस भरा हो।जाओ कह दो अब मैं लिखूंगा वह गुलाबी गुलाबी गीत जिसे पढ़ वह खूबसूरत होंट मुस्कुराएंगे।जाओ मैं तुम्हारी नही परवाह नही करता।मैंने भूख,चीख,तड़प, प्यास,टूटन,बिखरन सबसे मुँह मोड़ लिया है।हाँ हाँ तुम समझ लो यहाँ मेरे अंदर का इंसान मर चुका है और मेरा कवि हृदय ज़िंदा होकर आज कालजयी प्रेमगीत रचने वाला है।वह गीत जो कभी नही लिखा गया।ख़ून से सनी ज़मीन में खड़ा मैं आज नफ़रत से भीगी सियाही से वह अमर प्रेम गीत लिखने वाला हूँ जो मेरी कलम को अमर और मुझे मरा हुआ बना देगी।©

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