Thursday, July 14, 2016

झाँक कर देखो

मैं बहुत दिनों से हिन्दुओ से बात करना चाहता था।अब यह मत समझाइयेगा की हिन्दू धर्म नही सनातन धर्म है।जो चलन में है उसी का ज़िक्र कर रहा हूँ।निःसंदेह भारत भूमि में आपने ज़बरदस्त तरक्की की है।देश में मौजूद हर चीज़ में आपने श्रेष्ठ प्रदर्शन किया है।बस एक बार गौर से अपने पिछले चेहरे और आजके चेहरे को देखिये।आप भी सुबह से शाम तक मेरे राम और कृष्ण का ज़िक्र करते हैं मगर इन्हें अपने घर में पैदा होने नही देना चाहते।मैं आपकी पिछली सहनशीलता को दावे से कहूँगा की दुनिया में सबसे ज़्यादा थी,मगर अब नहीं।अब यह मत कहियेगा की त्याग और सहनशीलता कब तक।अगर इसकी सीमा निर्धारित हो जाए तो त्याग के अर्थ ही क्या।आपकी इतनी बड़ी आबादी इतने लम्बे वक़्त में इस वक़्त विवेकानन्द और दयानन्द का शून्य नही भर सकी है।
एक बार आजके हिन्दू धर्म के प्रचारकों को देखिये और विवेकानंद के प्रचार को देखिये।ज़मीन आसमान का अंतर होगा।जब कोई आपके मज़हब पर सवाल करता है,तो सोचता हूँ यह कितना बेवक़ूफ़ है जो इतने पुराने और प्राकृतिक धर्म को समझ नही पा रहें।वैसे मैं आपके संकुचित हो रहे हृदय को देखकर परेशान हूँ।सोचता हूँ आखिर यह क्यों इतने परेशान से हैं।मैं क़तई लाठीबाज़ो और हुड़दंगियो को हिन्दू नही मानता।बस इतना सोचता हूँ की यह जो हैं वह विवेकानंद को कैसे भूल गए।पूरे समाज से राजा राम मोहन राय गायब हो गए।कुछ लोग जवाब देंगे की क्रिया की प्रतिक्रिया में सब खराब हो गया तो वह अपने आप को सिर्फ एक वस्तु समझ लें क्योकि क्रिया की प्रतिक्रिया वस्तु में हो सकती है इंसान में नहीं।क्योकि इंसान में खुद को काबू करने की अद्भुत कला ब्रह्म जी ने दी है।मैं यह दावे से कहता हूँ की इस देश का हिन्दू जितना समझदार,जितना मोहब्बती,जितना संवेदनशील था वह कहीं का नही मगर पता नही क्या हुआ की जीव मात्र पर दया करने वाले यह लोग इंसान के ख़ून की गिनतियाँ क्रिकेट के स्कोर में कर रहे।यह हिन्दू तो नही ही हैं।मुझे लगता है हिन्दुओ को वेद, गीता, रामायण पढ़ने के बाद ज़िन्दगी में ज़रूर उतारना होगा।कुछ लोग अक्सर गीता का उदाहरण लेते हैं की अधर्म का तो नाश करना हमारी किताब में है तो भय्या अधर्म का नाश करने के लिए कृष्ण या राम बनना पड़ता है।रावण या कंस बनकर अधर्म का नाश नही हो सकता।
मेरे इर्द गिर्द जितने हिन्दू हैं मैं उन्हें बारीक़ से देखता हूँ तो सोचता हूँ यह कितने भले हैं।इनके दिल मासूम हैं मैं इनसे सीखता हूँ मगर इन्हें आगाह भी करता हूँ की चाहे जितनी विपरीत परिस्थिति क्यों न हो अपने को गलत दिशा में मत ले जाना।मैं अंत तक इन्हें डिगता हुआ नही देखना चाहता हूँ।विश्व स्तर पर यह अल्पसंख्यक हैं, इसलिए वहाँ इन्हें ज़्यादा तवज्जो नही दी जाती थी।फिर एक वक़्त ऐसा आया इनकी आध्यात्मिक और प्राकृतिक प्रेम की खुशबू दुनिया ने महसूस की यह इनके खूबसूरत दिलों के धर्म प्रचारकों का कमाल था जिसका रिज़ल्ट आज दिखता है मगर अब मैं भविष्य को लेकर सशंकित हूँ क्योकि इनके पास अब उन खूबसूरत दिलों का टोटा है।लगातार हिंसक संगठन और हिँसा और बदले से भरे दिल मुझे आपकी उस परम्परा से हटता हुआ दिख रहें हैं।आप लड़कर,बदला लेकर,नफ़रत करके यह ज़मीन तो जीत ही लेंगे जो पहले ही आपकी है मगर अपनी वह खुशबू ज़रूर भूल जाएँगे जो पीपल की जड़ो से निकलती हुई गंगा की लहरों में मिल जाती है।हो सकता है मैं आपको बुरा लगूँ,यह भी हो सकता है आप मुझे धर्म की नज़र से देख ख़ारिज कर दें मगर मैं एक खूबसूरत आत्मा को कीचड़ में घुसते हुए कैसे देखूँ।यह जो हिन्दू थे इन्हें ही तो देख कर खूबसूरत विचारों का जन्म हुआ उसे मैं कैसे खत्म होने दूँ।
मेरा यक़ीन न हो तो कृष्ण या राम दोनों का किरदार उठा कर देख लीजिये और अपने कर्म।गलत को प्रोत्साहन भी या मौन समर्थन भी अधर्म है।मैं चाहता हूँ आपके दिल में उतर कर देखूँ की यहाँ मेरे राम हैं या रावण आपकी रूह में झाँकना चाहता हूँ की देखूँ कृष्ण की मोहब्बत है या कंस की नफ़रत।दुनिया गलत हो जाए।सब बुरे हो जाए इसका मतलब यह नहीं की आप भी बुरे हो जाए।मैं इस देश में अमन और सुकून के साथ तरक्की आपके हाथों में देखते हैं क्योंकि आज से पहले भी आपने किया है।मैं अभी कह रहा हूँ की ठहर कर सोचिये,किताबें खँगालिये, पहले की सन्तों को पढ़िए फिर महसूस कीजिये अपनी दिशा और दशा।कुछ न हो तो अकेले में शांत मन से अपने हृदय की आवाज़ को सुनिए,मैं दावे से कहता हूँ की आपका हृदय आपको रत्ती भर धोका नही देगाअभी वक़्त है मुल्क़ के लिए सोच लीजिये।हिँसा जो की आपका धर्म नही है उसकी वकालत मत करिये।हमारे जैसे करोणों की आस्था आपकी प्राकृतिक सोच में है उसे मत दूषित कीजिये।आप बस हिन्दू रहिये।एक हिन्दू किसी की मौत पर तालियाँ नही पिटेगा,हिँसा नही करेगा,दूसरे को बेइज़्ज़त नही करेगा।लोग आपमे तमाम कमियां निकालेंगे मेरा यक़ीन मानिये उन मक्खियों के पास और कोई काम नही।आप अपने दिलों में झाँकिये जिसमे चर्वाक,धन्वन्तरि,पतंजलि,सत्यवान, युधिष्ठिर,दयानन्द,विवेकानंद,हरिश्चंद्र,ध्रुव, प्रह्लाद,श्रवण कुमार,रामकृष्ण परमहँस हैं, उन्हें महसूस कीजिये बिना किसी बहकावे के मेरा पुख़्ता यक़ीन है आप इस ज़मीन का उपजाऊपन बनाए रखेंगे।मुझे जो जी चाहे कह लीजिये मगर अपना वह प्राकृतिक चेहरा मत बदलिये जो हर तपिश में ठण्ड पहुँचाता रहा है।किसी बुरे की प्रतिक्रिया में इतना न गूँथ जाइये की उसकी बुराई आपको उसके जैसा कर दे।मुझे यक़ीन है की आप समझेंगे मेरी उलझन को,मेरी परेशानी को,बड़े दिन से बात करने का मन था आपसे।©

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