Wednesday, July 27, 2016

गऊ माँ

मैं गौ हत्या का इस पूरे जीवन में समर्थन नही कर सकता मगर इसका अर्थ यह नही की उसके विरुद्ध गुंडों बदमाशो का समर्थन करने लग जाऊँ।जब मुझसे गाय का ख़ून नही देखा जाता तो मानव का ख़ून कैसे बर्दाश्त करूँ।यह तो मेरी गऊ माता पर भी ज़ुल्म है।जो गऊ हत्या के विरुद्ध मानव हत्या को सही ठहरा रहे हैं, वह राक्षस हैं,देशद्रोही हैं।मैं इन मानव भक्षक की तरह देशद्रोही तो हूँ नही की कानून को ताक पर रखकर संविधान को बन्दकर दूँ।आप इतना समझ लीजिये आपकी लाखों करोणों दलीलें मुझे इंसान के विरुद्ध हिँसा का समर्थन करने को मनवा नही सकती।मुझसे सवाल से पहले अपने ख़ून से भीगे मुँह को आईने में देखिएगा।हमसे तब सवाल करियेगा जब हमारी ही तरह इस जीवन में कभी मानव हिँसा का समर्थन न किया हो।मैं आज वाक़ई गाय के पास जाना चाहता हूँ।बल्कि जाऊँगा।आज मैं गऊ माता से पूछूँगा की क्या आप वाक़ई एक माँ हैं या संसद भवन वाली माँ हैं।आपको वाक़ई हर बेटे से मोहब्बत है या कुछ खास बेटों से है।मैं अपनी,हाँ अपनी, गऊ माता से लड़ूं,झगडू या शिकायत करूँ आप हमे फ़र्ज़ी दलीले देने मत आइयेगा।आज मैं माँ से शिकायत करूँगा की जब तुम्हे एक तरह के बेटे मार रहे हैं और दूसरे तरह के बेटे उन बेटों को मार रहे हैं,तो तुम्हे यह अपने आँगन की खूनी लड़ाई कैसी लगती है।मेरी बात मान लो माँ,अब यह पृथ्वी छोड़ दो।जब माँ किसी घर को तहस नहस होने का कारण बन जाए,तो माँ के लिए घर की चौखट छोड़ देना ही बेहतर है।एक माँ ही होती है, जो अपने अच्छे या बुरे,दोनों तरह के बेटों का ख़ून नही बर्दाश्त कर सकती।राक्षस उसके बेटों को मारकर माँ का दिल चीर रहे हैं।माँ तुम अब चली जाओ,यह मनहूस ज़मीन छोड़कर।मुझे तुम्हारी काली बड़ी बड़ी आँखों से बहता आँसू मजबूर कर रहा है।हाँ या तब तक रुक जाओ जब तक इस बेटे की भी लाश न देख लो।मैं इस हाहाकार से तंग आ गया हूँ।हर तरफ जँगल राज है और माता तुम जँगल की नही,इंसानो के बीच रहने की आदि हो।आओ हम और तुम चलें,कहीं दूर चले,जहाँ इंसान हों।जहाँ जँगली इंसान न हों।माँ आपका और हमारा वक़्त पूरा हो चुका है।यह नही समझेंगे की जिसके हर हिस्से को,ईश्वर ने इंसान के लिए पालने वाला बनाया हो,वही को यह मानव संघार की वजह बना रहे हैं।चलो माँ,प्लीज़ अब और ख़ून तुम्हारे नाम पर बर्दाश्त नही हो रहा।अपना दामन ख़ूनी करने से पहले यह रक्तभूमि छोड़ दो माँ।यह जो तुम्हे घमण्ड के नशे में, माँ कह कह कर ख़ून बहा रहे हैं, यह तुम्हे इंसानो का ख़ून चाटने पर मजबूर कर देंगे।तुम मामूली चोटों को चाटकर सही तो कर सकती हो माँ,मगर कटी गर्दन को तुम नही जोड़ पाओगी।वैसे भी तुम्हारी साफ़ ज़बान पर ख़ून नही देखा जा सकता।माँ इन नालायक़ बेटों के साथ जीने से बेहतर है मर जाना।चलो वैसे भी यह अब धर्मभूमि रही ही नहीं।यहाँ राक्षस हर मौत पर ठहाके लगाकर हँस रहे हैं।राक्षस कुल के राज में देवतुल्य माँ का प्रवास ही बेहतर विकल्प है।अब मैं तुम्हारे काले जिस्म पर लाल ख़ून की छींटे नही देखना चाहता।चलो,यह पृथ्वी छोड़ने का वक़्त निकट आ गया माँ।चलो दूर,जहाँ इंसान रहते हों।चलो,अब चल दो।©

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