Wednesday, April 13, 2016

गँगा कविता में

मैं बहती हूँ,
तुम्हारे साए में,
कमज़ोरियों में,
सिर्फ तुम्हारे लिए,
मैं बहती हूँ,
पहाड़ों में,
मैदानों में,
रेत में,
जंगल में,
गाँव में,
कस्बो में,
शहरो में,
सिर्फ तुम्हारे वास्ते,
तुम्हारी प्यास के वास्ते,
तुम्हारे वजूद के वास्ते,
मैं हूँ तो तुम हो,
मुझे बहने दो,
निर्मल बहने दो,
निश्छल बहने दो,
अविरल बहने दो,
अपनी गँगा को,
हाँ माँ गंगा को,
इक धार बहने दो।।।।।।

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