मैं बहती हूँ,
तुम्हारे साए में,
कमज़ोरियों में,
सिर्फ तुम्हारे लिए,
मैं बहती हूँ,
पहाड़ों में,
मैदानों में,
रेत में,
जंगल में,
गाँव में,
कस्बो में,
शहरो में,
सिर्फ तुम्हारे वास्ते,
तुम्हारी प्यास के वास्ते,
तुम्हारे वजूद के वास्ते,
मैं हूँ तो तुम हो,
मुझे बहने दो,
निर्मल बहने दो,
निश्छल बहने दो,
अविरल बहने दो,
अपनी गँगा को,
हाँ माँ गंगा को,
इक धार बहने दो।।।।।।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, April 13, 2016
गँगा कविता में
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