एक मुहावरा था "पेट भी जले और पीठ भी जले"।सेना और संघर्ष में यह बिल्कुल सही लगता है।जब सेना कुकर्म की तरफ बढ़ती है तब पेट जलता है, जब सेना पर ऊँगली उठती है तो पीठ जलती है।सौ फीसदी तो ना नागरिक सही हैं और ना हीं सेना।मैदानी इलाकों में बैठकर सेना का सम्मान तो हम खुद करते हैं, मगर पहाड़ी इलाकों में कुछ जगह सेना गलत होती है।जब बलात्कार जैसे आरोप सेना के किसी भी जवान पर लगें तो बुरा लगता है।जब ट्रेन के डब्बों में सेना के जवान जबरन कब्ज़ा कर ले तो बुरा लगता है।वहीं जब नागरिक सेना के सम्मान को ठेस पहुंचाए तो बुरा लगता है।जब अन्तर्राष्ट्रीय उंगलियां हमारी सेना पर उठे तो बुरा लगता है।वैसे गलत को गलत कहने की हिम्मत होनी चाहिए।एक तरफ किसी दुर्घटना में सेना के मदद के हाथ सर झुकाने को मजबूर कर देते हैं, वहीं दूसरी ओर किसी औरत के जिस्म पर हाथ डालते सेना के हाथ सर को शर्म से झुका देते हैं।जिन्हें लगता है ऐसा सेना के जवान नही करते हैं वह पहले तो कुंवे से निकले और देखे देश कितना बड़ा,कितनी विविधता और कैसे बसा हुआ है।मेरे दिल में सेना के लिए दूसरे किसी भी नागरिक से ज़्यादा इज़्ज़त है इसलिए उनको गुनाह की छूट भी कम ही होगी।जिसके दिल में मुल्क और सेना से मोहब्बत होगी वह किसी भी हाल में नही चाहेगा की सेना का जवान दुराचरण का हो।जो गलत को गलत नही कह सकता वह बुज़दिल है और एक बुज़दिल कभी सैनिक नही हो सकता।सैनिक देश की मान मर्यादा के लिए जान देता है, मर्यादा तोड़ता नही है।सलाम उन सैनिकों को जिन्होंने आजतक इस परम्परा को निभाया है।जो गलत हैं वह सज़ा पाएँगे, हमारे कानून में बहुत ताकत है।सेना की इज़्ज़त कीजिये,वह आपकी इज़्ज़त के लिए लड़ेगी।
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