Tuesday, April 12, 2016

Sufiyana

कुछ अल्फ़ाज़ कानों तक जाते हैं और कानों में ही रह जाते हैं।जबकि कुछ अल्फ़ाज़ कानों से सीधे दिल में उतर जाते हैं।वह दिल को तरोताज़ा कर देते हैं उसके दिल में उतरते ही चेहरे पर एक रौशनी निखर आती है।वह रौशनी पूरा किरदार महका देती है।वही एक अल्फ़ाज़ है सूफ़ी।सूफी आज तक लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं।बसरा की गलियों से दमिश्क की चौखट से होता हुआ यह अल्फ़ाज़ जब हिंदुस्तान के आँगन में पहुंचा तब दुनिया ने देखा सूफ़िज़्म क्या है।इसमें कितनी ताकत है की पत्थर से पत्थर दिल को भी पिघला देती है।सूफ़ीवाद को लेकर बहुत तरह की बातें होती हैं।इसे अलग अलग तरह समझा जाता आया है।
सूफ़ी के कई मायने निकाले जाते हैं।कोई कहता है की यूनानी है और सोफिस्ट से आया है।कुछ का मानना है कि यह अरबी है।अरबी सफा से यानि पवित्र से निकला है।बहुत से विचारक सूफ़ी को सूफ़ यानि ऊन से जोड़ते हैं क्योकि सूफ़ी सन्त ऊन का ही चोगा पहना करते थे।कुछ विद्वान मानते हैं सूफ़ी अहलुससफह से आया है यानि बेंच पर बैठने वाले तपस्वी जन।
कुछ लोगों का मानना है यह सफ़े अव्वल यानि पहली पंक्ति के लोगों से आया है।बाद के काफी लोगों ने सूफी के मायने  तसव्वुफ़ यानि आध्यात्म से निकाला।खैर मायने कोई भी हों मूल तो यही है की समझदार,आध्यात्मिक,विरक्त त्यागी लोगों का समूह जिसे किसी दुनयावी यानि भौतिक जीवन से कोई मोहब्बत न हो।
सूफ़ी अल्फ़ाज़ बेहद बाद में चलन में आया।इससे पहले आरिफ़, आशिक़, मर्दे माहिर,मर्दे ख़ुदा, दरवेश और तसव्वुफ़ जैसे अल्फ़ाज़ चलन में थे।वैसे सूफ़ी मत का सीधा ताल्लुक पैगम्बर मोहम्मद से मिलता है।उनकी ज़िन्दगी के दो पहलू थे।हर पहले ज़बरदस्त ज्ञान से निकला था।उनमे से एक जग ज़ाहिर कुरान है जिसे इल्मे सफ़ीना कहा गया।यह हर खास ओ आम के लिए था।वही दूसरी तरफ इल्मे सीना था जो सिर्फ सूफियों के लिए था।इल्मे सीना पैगम्बर मोहम्मद,अबु बक्र, अली और बिलाल के ज़रिये चला।इल्मे सीना पीर मुर्शिद से मुरीद के रास्ते चला और एक के बाद एक सूफ़ियों तक पहुंचा।सूफ़ी को हिंदी में रहस्यवादी कहा गया है।जिसके पीछे की वजह भी यही रही होगी की उनके उठने बैठने के तौर तरीके,प्रार्थना के नियम,जीवन का अनुशासन ऐसा कठिन था की वह आम लोगो की समझ से बाहर था।बहुत से सूफ़ियों को उनकी इसी शैली की वजह से सज़ाए दी गई।कभी जासूस समझा गया।उन्हें परेशान किया गया।मारा गया।मौत दी गई मगर वह मुस्कुराते हुए लोगों के दिलों में ज़िंदा हो गए।
सूफ़ीवाद की शुरआत इस्लाम केहि तौर तरीकों से हुई मगर जल्द ही इसने एक अलग रँग ले लिया।शुरआत में सहाबाओ की ज़िन्दगी से सीखते हुए उन्हें ही अपनाया गया।ख़ुदा का ज़बरदस्त ख़ौफ़ सूफ़ियों पर तारी था।वह हमेशा दीन की कठिन राह पर खुद को तपाते रहे।सूफ़ी मत का मानना था की दुनिया में जितनी तकलीफ़ होगी आख़िरत उतनी सुनहरी होगी।त्याग की वह हवा चली की सूफी अपना सब कुछ छोड़कर खुदा की राह पर चल दिए।
सूफ़िज़्म अरब की रेत में रोज़ बरोज़ निखरता रहा।एक से एक बादशाह और एक से एक फकीर इसकी ज़द में आते चले गए।यहाँ अफगानिस्तान के बल्ख़ का किस्सा बताना ज़रूरी हो जाता है।एक रोज़ बल्ख़ के बादशाह इब्राहिम बिन अधम सो रहे थे।वह ख्वाब देखते हैं की कोई महल की छत पर है।वह उससे पूछते हैं की यहाँ क्या कर रहे हो?उधर से जवाब आता है ऊँट ढूंढ रहे हैं।बादशाह खूब ज़ोर से हँसता है और कहता है की कहीं कोई छत पर ऊँट ढूंढता है बेवकूफ।तब उधर से आवाज़ आती है जब तुम बादशाह के तख़्त पर बैठ कर ख़ुदा को ढूंढते हो तो मैं छत पर ऊँट नही ढूंढ सकता।बादशाह अधम की आँख खुल जाती है।पसीने और डर से घबराया बादशाह एक झटके में सबकुछ छोड़कर ख़ामोशी से ख़ुदा की राह में निकल जाता है।वह इतना मशहूर सूफ़ी बनता है की उसकी हर हरकत मिसाल हो जाती है।
सूफ़ियों ने अपनीअलग चाल से बहुत से नए रास्ते बनाए।जहाँ अभी तक सूफ़ी खुदा के डर के साय में जी रहे थे वही यह डर भी खत्म हो गया।ख़ुदा के डर को मोहब्बत में बदला मशहूर सूफ़ी सन्त राबिया बसरी ने।उन्होंने मोहम्मद साहब से दोस्ती की राह बनाई।ख़ुदा को महसूस करने पर ज़ोर दिया।डर की जगह मोहब्बत को अपनाया तभी तो राबिया बसरी की कलम इतना तेज़ धार चल पाई....
मेरे एक हाथ में मशाल है,
दूसरे हाथ में पानी की बाल्टी,
इनके साथ मैं जन्नत में आग लगा दूंगी,
और दोज़ख की आग बुझा दूँगी,
ताकि अल्लह के राही पर्दों को चीर दे,
और देखें असली अल्लाह को।।
अरब की ज़मींन से होते हुए जैसे ही सूफ़ियों का सामना हिन्द की ज़मीन से हुआ सूफ़िज़्म का एक अलग रँग निखर गया।जो सूफी दजला और फरात के पानी में वज़ू कर रहे थे जैसे ही उनका हाथ गंगा और यमुना में पड़ा एक अलग ही चमक बिखर गई।यहाँ की पहलेसे आध्यात्मिक ज़मीन सूफ़िज़्म के लिए बेहद उपजाऊ साबित हुई।बुल्ले शाह,बाबा फ़रीद, गुरु नानक,बख्तियार काकी,मोईनुद्दीन चिश्ती से होते हुए सूफ़ी भारत के हर कोने में बिखर गए।हिन्दुस्तान के सबसे मज़बूत फ़न संगीत में भी सूफियाना रँग आ गया।यहाँ के संगीत में सारंगी,सितार शामिल हो गया।सूफ़ियों ने इसे इतना बढ़ाया की सूफी संगीत उस ऊंचाई पर पहुँच गया जहाँ कोई नही पंहुचा।बुल्ले शाह ने वह रचनाएँ की  गुरु ग्रन्थ साहिब में छा गए।मलिक मोहम्मद जायसी ने तरह तरह की ठुमरिया रंची, पहेलिया,मसनवी और बहुत से संगीत यन्त्र बनाए जिससे सूफ़ी संगीत ज़मीन से आसमान तक पहुँच गया।
दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया के सबसे योग्य शिष्य अमीर खुसरु ने तो जैसे सूफी संगीत को  धार देदी।ज़बान ज़बान पर सूफ़ियों का रँग चोखा होने लगा।पूरा हिन्दुस्तान इनकी मोहब्बत की धुन में झूम उठा।सभी सूफ़ियों ने हिन्दुस्तान की रूह को पकड़े रखा।हिन्दुस्तान की मोहब्बत और बेलौस मिलने जुलने की परम्परा को खूब आगे बढ़ाया।सूफ़ियों ने भगवान और ख़ुदा का फासला लगभग खत्म कर दिया।लोग सूफ़ियों से इतना प्रभावित हुए की उनमे ही अपनी सारी मुश्कलो का हल ढूंढने लगे।सूफीमत ने हिन्दू मुसलमान का फ़र्क खत्म करते हुए इंसान होने का एहसास करा दिया।दर्द को दर्द से जोड़ा।तकलीफ़ में बराबर खड़े होकर दिलों को एक कर डाला।यह कमाल सिर्फ सूफी ही कर सकते थे उन्होंने किया।
उस दौर में जब ज़िन्दगी कठिन थी तब ज़ख्म पर फाहे का काम किया सूफ़ियों ने।लोगो की तकलीफ़ में मरहम का काम किया।सूफी सन्तों की ज़िन्दगी आदर्श बन गई।सूफी डांस,सूफी संगीत,मसनवी सब लोगों के दिल ओ दिमाग पर छा गई।रूमी की मसनवीयो ने तो रेत में छाँव का काम किया।सूफ़ियों का दिलों पर डेरा हो गया।बादशाह से फ़क़ीर सब उनके दर पर हाथ फैलाए खड़े रहने लगे।भारत के हर हिस्से ने सूफ़ियों के पैर पड़े।जँगल, ज़मीन, रेगिस्तान,पहाड़ सब जगह वह पहुंचे।लोगो के दर्द ने खड़े हुए।उनसे मोहब्बत की,उनको सुना,समझ6फिर वह रास्ता दिखाया जिसकी अवाम को सदियों से तलाश थी।सूफी अगड़ी पिछड़ी हर जगह पहुंचे वही रहे,वही खत्म हुए वहीँ दफनाए भी गए।आज भी उनकी मज़ारे और उनपर लगने वाली भीड़ उनके होने का एहसास कराती है।आज भी हममे और आपमे मोहब्बत और ख़िदमत की शक्ल में सूफ़ीवाद ज़िंदा है, जो हमेशा ज़िंदा रहेगा।यही तो सूफ़ीवाद है।
हफ़ीज़ क़िदवई

2 comments:

  1. बेहतरीन लिखा है आप ने। .. मैं ऐसा नहीं लिख पाता। आपकी क़लम कमाल है।

    ReplyDelete
  2. sir aapse hi to sikha hai......shukriya

    ReplyDelete