Tuesday, April 26, 2016

सूफी

शाहशुजा किरमानी लम्बे वक़्त नहीं सोए।यहाँ तक जब नींद आए तो आँखो में नमक लगा लें।एक अरसे के बाद जब सोए तो ख्वाब में ख़ुदा को सुना।वह बोल उठे या ख़ुदा हम हमेशा जागे की आप को पा लें मगर आप तो ख्वाब में आए।आवाज़ आई शाहशुजा तुम बादशाह थे।तुमने जाग कर मुझे ढूंढा।उस जागने में तुमने ख़ल्क़ की खूब ख़िदमत की।खूब काम किया।आवाम की हर परेशानी दूर की साथ में तुम्हारी आँखे मुझे ढूंढती रही।एक पल के लिए नही भुलाया।तुमने अपने हाँथो से बीमार गुलामो की ख़िदमत की,पैर दबाए।तुमने ज़ख्मो पर खुद मरहम रखा और रात रात तुम मुझे ही याद रखते रहे।तुमने दिन दिन काम किया और रात रात अपने ख़ुदा को याद किया।तो तुम समझ लो तुम्हारा ख़ुदा तुमसे कितनी मोहब्बत करता है।अगर मैं तुमहे जागते में मिलता तो तुम ताउम्र जागते इसलिए ख्वाब में आया हूँ।ताकि मेरा बन्दा तकलीफ़ में न रहे।कहते हैं शाहशुजा ने फिर सोना शुरू किया कभी कभी।मगर फिर ख्वाब का क्या हुआ पता नही बस इतना की वह अपने दोनों बच्चों को भी ख़िदमत में लगा ले गए।उनके बेटे ने हिंदुस्तान का रुख किया और राजस्थान,दिल्ली,अवध होते हुए अवध की सरहद पर रौशनी बिखेरते हुए सो गए।उनके बेटे महल,सल्तनत एक गुलाम वज़ीर को दे कर खिदमते ख़ल्क़ के लिए निकल गए।सुल्तान ने फखीरी अपना ली यही तो कमाल था सूफ़िज़्म का।बेटी का क़िस्सा तो बेहद नायाब है।उनसे जुड़े बहुत से किस्से हैं जो शायद कभी लिख पाऊँ, सैकड़ो सूफ़ियों के किस्से हैं शायद कह पाऊँ।हज़ारों दास्ताँ याद हैं शायद उन्हें पहुँचा पाऊँ।अमन और मोहब्बत के लिए सूफ़िज़्म एक बड़ा रास्ता है जो कठिन है मगर मंज़िल तक जाता है।जिन्हें भी मुल्क़,आवाम की ख़िदमत करनी है वह सूफ़िज़्म पढ़ें, समझें और उतारे।हम भी अपनी शाम से पहले सब लिख डालना चाहते हैं।

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