Tuesday, April 19, 2016

जँगल

तुम्हे पता है यह जो देवनागरी लिपि है यह जँगल से निकली है।हर अक्षर को पेड़ पर लटकते जानवरों की छाया से बुना गया है।संगीत भी जँगल से निकला है।खाना,पहनना यहाँ तक तुम्हारी हर हरकत इन जंगलो से ही निकली है।तकलीफ़ होती है जब इन जँगल को खत्म होते देखता हूँ।इन्हें कटवाने वालों को जाहिल भी नही कह सकता।एक झटके में हज़ारों पेड़ काटकर कमबख्त विकास करना चाहते हैं, झूठे।देखते देखते बहुत से जँगल हमारे इर्द गिर्द के कहाँ गए पता नहीं।अब कोई नही खड़ा होता चिपको आंदोलन जैसा।जब सरकारें हरे हरे पेड़ो को काटकर कंक्रीट का शहर खड़ा करती हैं तब तकलीफ़ होती है।पानी को तरसेंगे हम सब इसका पुख़्ता यकीन है।मैं एक पेड़ को कटता हुआ देखता हूँ तो सोचता हूँ हमारे आने वाले बच्चों की सांसे रुक रही हैं।जिन्हें ज़रा भी फ़िक्र है वह आगे आए, उन सरकारों के दामन खींच ले जो आपके बच्चों की सांसे खत्म कर रही हैं।उन अफसरों का पानी बन्द कर दे जो आपके हिस्से का पानी खत्म कर रहे हैं।अगर वह एक जँगल काँटे तो उनके घरों में इतने पेड़ लगाए की जँगल हो जाए।आइये अपने कदम खुद उठाए, जहाँ जगह दिखे पौधा रोप दे।माँ-बाप हमे पैदा करते हैं, पालते हैं मगर यह पेड़ ही हमे ज़िंदा रखते हैं।जँगल बचाइये अगर मज़हबी फसादों से फुर्सत मिल जाए।पेड़ लगाइये अगर अपनी संस्कृति बचाए रखनी है तो।हिम्मत करके अपने नेताओं और अफसरों से पूछिये की क्या पेड़,जँगल काटना ही अंतिम विकल्प था।धर्म की रक्षा से पहले सांसो की रक्षा कीजिये।मुझे पता है इस सब्जेक्ट में मसाला नही है, मज़ा नही फिर भी बच्चों की ज़िन्दगी के लिए तवज्जो दीजिये।

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