एक सोच है की ग़रीब, कमज़ोर कभी अर्श तक नही पहुँच सकता।यह वही सोच है जिसे बहुतों ने सबसे ज़्यादा झुठलाया है।एक वक़्त में लोहार,गड़रिये, मज़दूर,ग़ुलाम जैसों ने अर्श पाया है, बस यह अपने विचारों पर टिके रहे और उसे हवा देते रहे।जानवरों को घास डालते हुए जब कन्फ्यूशियस राज्य के सिद्धान्त सोचता था तो किसी को भी उसपर यकीन नही था।27 साल ज़िन्दगी के मज़दूरी,बेकारी में बीत जाने पर जब उसने 8 बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तब भी वह फ़िज़ूल ही था।37 साल की उम्र में उसने चीन की परम्परागत किताबों को खंगाल डाला फिर एक सिद्धान्त रखा।ईश्वर,राज्य और जनता का सिद्धान्त।जिसके सामने सब झुक गए। कन्फ्यूशियस ने बड़े बड़े दार्शनिको से कहा "मैं सत्यभास को सत्य से,जौ को गेंहूँ से,मीठी ज़बान को अच्छाई से और कड़वे वचन को ईमानदारी से अलग मानता हूँ तभी सही न्याय कर पाता हूँ"। कन्फ़यूशियस घर घर में सन्त,दार्शनिक,शिक्षक,सलाहकार की हैसियत से जज़्ब हो गया।जब वह भेंड़ों की खालों में पड़े कीड़े बीन रहा था तब किसने सोचा था यह चीन की सत्ता में पड़े कीड़ो को निकाल फेकेगा और भेड़ की तरह ज़मीन को भी साफ कर देगा।आपको भी सलाह है अगर कोई विचार है तो उसपर काम कीजिये।वक़्त लगता है तो लगे।लोग खलिहर, फालतू,बेकार या जो आए कहें उसे सुनने के साथ मेहनत कीजिये।अगर आपका विचार इस नकारात्मक वातावरण से आपको नही निकाल सकता तो आपका विचार दूसरे को क्या ऊर्जा देगा।ऐसा विचार किस काम का जो समाज के नकारात्मक प्रतिक्रिया में ढह जाए।इसलिए ऐसा मज़बूत विचार रखे जो आपको मज़बूत करे,वही आगे चलकर समाज को मज़बूत करेगा।उस विचार को ही थाम लीजिये,वह बीज है जिसमें लम्बी प्रक्रिया के बाद अँकुर फूटेगा।बस मेहनत,ईमानदारी के साथ विचार को बढ़ाये रखें।कन्फ्यूशियस हमारे इर्द गिर्द ही है।
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