Wednesday, April 27, 2016

शाह की बेटी

मज़ा तो तब आया जब किरमान के बादशाह के यहाँ उनकी बेटी के लिए पड़ोसी मुल्क़ के सुल्तान के बेटे का पैग़ाम आया।सूफ़ी मिजाज़ में ढल चुके शाहशुजा इससे पीछा छुड़ाना चाहते थे।जाकर सन्नाटे में एक पत्थर की आड़ में बैठ गए और सोचने लगे।इतने में एक बेहद गरीब मगर चेहरे पर अजब चमक वाले किसी लड़के को देखा।पास गए तो देखा वह बड़ी लगन से ख़ुदा से आवाम की मुश्किलात दूर करने की दुआ करते जा रहा था और किसी ग़ुलाम के पैर का ज़ख्म साफ कर रहा था।उन्होंने उससे कहा तुम शादी करोगे।लड़का बोला मुझ ग़रीब से कौन शादी करेगा।शाहशुजा बोले मैं किरमान का बादशाह तुम्हे अपनी बेटी का हाथ देना चाहता हूँ।तुम नेक,परहेज़गार और खिदमतगार हो।तो इस तरह शादी हुई और रात में उनकी बेटी सुसराल पहुँची।वहा टूटे से घर में एक कटोरे मे सूखी रोटी के टुकड़े और एक पतीली में दूध रखा देख वह उठ गई और वापिस अपने मैके यानि बादशाह के महल जाने लगी।तभी उसका शौहर बोला मुझे पहले ही पता था की मलिकाएं झोपड़ी में नही रुका करती और सुखी रोटी तो उनके गले में फंसेगी।तभी वह रूकती है और शौहर की तरफ मुखातिब होकर कहती है हाँ मैं अपने वालिद के यहाँ जा रही हूँ यह पूछने की उन्होंने कहा था की तुम्हारी शादी अल्लह के नेक,परहेज़गार बन्दे से कर रहे हैं मगर यहाँ तो उल्टा है।जो शख्स कल के लिए सुखी रोटी और दूध बचाकर रख ले उसका ईमान कितना कमज़ोर है वह ख़ुदा पर भरोसा न रखकर अपने पर एतबार कर रहा।ऐसे होंते हैं कहीं ईमान वाले।शौहर शर्मिंदा होकर माफ़ी माँगने लगे।यह बाप,बेटा,बेटी और दामाद सब आला दर्जे के सूफ़ी हुए जिन्होंने अपने किरदार से रेत तो रेत जँगल में भी इंसानियत पैदा कर दी।सूफ़िज़्म का झोंका हर हारे हुए को ताज़ा करने की क़ूवत रखता है।

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