रोज़ रोते हो बेरोज़गारी,महँगाई, भृष्टाचार,बेईमानी,गैर बराबरी पर।इतना रोते हो की रोनू हो गए हो।अच्छा यह झूठ मूठ का रोना हमारे नेता खूब समझते हैं।वह जानते हैं यह सिर्फ ड्रामेबाज़ लोग हैं।रोज़ रोएँगे।अगर इनका रोना,तकलीफे,गम सब सच्ची होती तो वह नेता जो इनकी दिल से बात करते थे,इनके लिए मरते थे,इनकी तकलीफो के लिए अपना सबकुछ खत्म कर दिया वह हाशिये पर ना होते।वह नेता इनके घरों में होते।इनके बच्चों में होते।आज वैसे ही एक नेता मधु लिमये का जन्मदिन है।जिसने अपनी पूरी ज़िन्दगी तबाह कर दी अवाम के लिए और यह अवाम,जिसके ज़हन के किसी हिस्से में उनका नाम नही है।मैं खुश होता हूँ देख कर की ड्रामेबाज़ लोगों को ड्रामे में माहिर नेता मिल गया।मधु लिमये को मैं जब पढता हूँ,समझता हूँ तब एक बात तो यक़ीन से कह सकता हूँ की अवाम के लिए इससे अच्छा कोई क्या सोच सकता है।वह जो दिलों को जोड़कर,बराबरी का हिन्दोस्तान बनाना चाहता था ज़मीन में बराबर सो गया।हमे उनके होने का कोई एहसास तक नही।थोड़ा सा मधु लिमये को पढ़ लीजिये तो शायद हिंदुस्तान के बारे में कुछ अच्छा सोच पाइए।जो अपने मज़बूत किरदारों को भुला देते हैं, महशर में सबसे पहले उनका किरदार गिरता है।सलाम मधु लिमये।
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