उसकी अँगड़ाई,
उसकी चंचलता,
उसका अल्हड़पन,
यही तो है मेरी गंगा।
उसकी मुस्कान,
उसका बहाव,
उसकी तरलता,
यही तो है मेरी गंगा।
धोती हुई पाप,
पोछती आँसू,
देती है मुक्ति,
यही तो है मेरी गंगा।
माँ का आँचल,
बहन का समर्पण,
पत्नी का साथ,
यही तो है मेरी गंगा।
थाम लो,
संवार दो,
निखार दो,
जैसे थी मेरी गंगा।
भविष्य कहेगा,
समय बोलेगा,
बच्चे पढ़ेंगे,
यही तो है मेरी गंगा।
हम सबकी गंगा।
ज़मीन ओ आसमान की गंगा।
यही तो है मेरी गंगा।।।।।।।।।।।।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, April 28, 2016
मोरी गंगा रे
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