Monday, April 25, 2016

पार

{ये नज़्म १४ अगस्त की रात को लिखी और १५ अगस्त की सुबह पढ़ी। .. ये पूरी नज़्म तो नि है हा उसके कुछ अशार है जो आपके सामने रखता हु }

आज इस पार खड़ा हूँ मै  

उस पार खड़े तुम भी हो 

आंसू है हमारी आँखों में 

तो ग़मज़दा तुम भी हो 

जिगर मचलता है मेरा यहाँ 

तो ज़ख़्मी दिल तुम भी हो 

रोटी को ढूँढती है निगाहे

तो  मुफलिस तुम भी हो 

गला हमारा रुन्धता है यहाँ

 तो मायूस आँख तुम भी हो।

रूह बिलखती है देख सन्नाटा

तो घुटता अँधेरा तुम भी हो 

चिराग मै ढूँढता हूँ यहाँ 

 रौशनी के मुन्तज़र तुम भी हो 

मुल्क परेशां यहाँ भी है 

तो यार बीमार तुम भी हो 

दर्द में तड़पन है इधर

चाक सीना तुम भी हो

आओ मिलकर फिर महकें

पहले जैसे हमारे तुम भी हो।

मुल्क़ परेशान है यहाँ
तो यार बीमार तुम भी हो।।
इस पार खड़ा हूँ मै 

उस पार खड़े तुम भी हो। .. .............

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